शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

#भारशिव वंश #पासी जाति में आने वाली #उपजातियां The #subcastes of the #Pasi of the #Bharshiva dynasty

 #पासी_जाति_से_टूट_कर_अलग_हुई_जातिया

#टूटी_हुई_उपजातियां

#पासी_राजभर_अरख_खटिक_जाति


नमस्कार दोस्तों एक बार आपका फिर से स्वागत है दोस्तों पासी जाति के इतिहास के बारे में मै आपको कोई न कोई जानकारी देता रहता हूं दोस्तों ऐसी ही आज आपके सामने जानकारी लेकर आया हु #पासी_जाति_के_उप_जातियों के बारे में 

दोस्तों बात की जाय भारत की तो भारत जातियो का देश है 

भारत पहले जातियों में बटा है फिर वह जातिया उपजातियों में  बटी है फिर वह उपजातियां भी उपजातियों में बटी है 

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जहाँ कुछ जातिया अपने इतिहास को जानकर 

अपने पूर्वजो पर गर्व करती है

 यहाँ तक चमार जाति के लोग भी अपने पूर्वजो का इतिहास जानकर अपनी जाति पर गर्व करते है और इसी कारण दा ग्रेट चमार का मिशन भी चला रहे है जितनी भी चमार ग्रुप की उपजातियां थी घसिया झुसिया मोची जाटव  यह सभी जातिया चमार लिख कर एक हो गयी और इस कारण वहः आज सत्ता की दहलीज तक पहुच गयी  है और इसी तरह यादव कास्ट की जितनी भी उपजातीया थी वह भी यादव लिख कर एक हो गयी है और इस तरह यादव भी सत्ता तक पहुच गए  है 

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इस मुहीम में पासी जाति अभी बहुत पीछे है

पासी जाति की जितनी भी उपजातियां है उन्हें पासी जाति के सन्गठन और नेता एक नही कर पाए पासी जाति की जितनी भी उपजाति है वो पासी न लिख कर अपनी उप जाति को महत्व देते है और इसी कारण कई बार आपसी मत भेद भी हो जाता है पासी जाति की उप जातिया जैसे

1बौरासी    

2कैथवास   

3राजवंशी   

4 खटीक    

5 अरख

6 गूजर

7 पसमंगता

8 बहेलिया

9भर


आदि सभी उप जातिया अपने नाम के साथ अपनी उप जाति लिखती है 

अगर ये सभी उप जातिया अपने आपको अपनी उप जाती से सम्बोधित करेंगे तो इसमें पासी कौन है 

इसमें पासी तो हैं ही नही पासी एक पेड़ है जो इन सभी उपजाति नाम की डालियों को अपने आप से जोड़ कर रखे है


इसमें से कुछ जातिया तो अपने आपको पासी लिखती है 

लेकिन कुछ उपजातियां  जैसे #भर #अरख #खटीक अपने आप को पासी जाति से अलग स्वतंत्र जाती के रूप में दरशाती है  ये जतिया कब पासी जाति से टूट कर अलग हो गयी  कुछ पता ही नही चला इस पर गहन चिंतन और शोध करने की आवश्यक्ता है 

अरख भर और खटीक ये जातिया भारत को आजादी मिलने तक तो पासी जाति से ही सम्बोधित की जाति थी लेकिन आजादी के बाद ऐसा कौन सा समय आया की वो जातिया अलग हो गयी कुछ बुद्धजीवी है जो यह शिवकार करते है कि ये जातिया भी पासी जाति में ही सम्मलित है इसके प्रमाण भी मिलते है  इनके प्रमाण कुछ इस तरह है 

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           अरख पासी के 

         पासी होने के प्रमाण

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(1) पुस्तक हरदोई  संस्कृतिक गजेटियर  इसकी लेखिका है अंजली चौहान 

पेज नम्बर 114 पर लिखती है

आरख जाति के उत्तपत्ति के बारे में लिखती है रसल और  हीरालाल के अनुसार आरख लोग पासी और बहेलिया जाति से ही सम्बन्ध रखते है इनकी परम्पराये भी पासी जाति से मिलती है

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(2) लेखक विजय सोनकर शास्त्री

पुस्तक हिन्दू खटीक जाति

चैप्टर हिन्दू खटीक जाती एवं उपजातियों की सूचि 25 नम्बर पर अरख जाति के बारे में लिखते है

अरख- इसे पासी  या बहेलिया जाति की उपशाखा और पासी की वर्णसंकर जाति कहते है

अर्थात पासी ही कहते है

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(3)डॉक्टर अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय खण्ड 4 के पेज 222 ,23 पर बाबा साहेब भी इस बात को सिवकार करते है वह लिखते है कि 

आरख जाति पासी जाति की ही उप जाति है लेकिन यह जाति भी अपने आपको स्वतंत्र जाति के रूप में  दरशाती है

ऐसे बहुत से प्रमाण मिल जाते है जो अरख जाति को पासी जाति के रूप में दरसाते है 

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        अब देखे भर पासी के 

         पासी होने के प्रमाण

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1  hindu tribe and cast as representetd in benares valume 1 1872 के चैप्टर 5 पर 

पासी जाती की उप जाति की लिस्ट दी गयी है  

जिस लिस्ट में पासी जाति की 9 उपजातियां दी गयी है उस 9 उप जाति में भर जाति नवे नम्बर पर दर्ज है 

वो कुछ इस तरह है

1 jaiswara    6 chiriyamar

2 kainswat   7 biadh

 or kaithwan 8 bihari

3 gujar         (  9 bhar)

4 trisuliya   

5 pasiwan   

                     

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2   इन्डियन फ्रांचिस कमेटी वैल्युम 2

पेज नम्बर 439 पर अंग्रेज इतिहासकार मिस्टर ब्लंट लिखते है

Bhar is an untouchable, as has been shown in Mr. Blunt's note, and is the other name for Pasi.

हिंदी अनुवाद है

भर एक अछूत जाती है, जैसा कि मिस्टर ब्लंट के नोट में दिखाया गया है, और भरो का दूसरा  नाम। पासी है

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3 THE JOURNAL OF THE

ROYAL ASIATIC SOCIETY

OF GREAT BRITAIN AND IRELAND.

VOLUME THE FIFTH.

चैप्टर दा भर ट्राइब  पेज नम्बर 395 पर पासी और भर जाति के विषय पर कुछ इस तरह  लिखा है


by some persons the bhar are included in the caste of pasis


इसका हिंदी अनुवाद है 

कुछ लोगो का मानना है कि भर जाति पासी जाति में ही समिल है अर्थात भर पासी जाति में ही आते है

यह पूरा चैप्टर भर जाती पर आधारित है इस चैप्टर पर सिर्फ भर जाति पर ही फ़ोकस किया गया है उसके बाद भी यह शिवकार किया गया है 


और भी ऐसे बहुत से प्रमाण मिलते है

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             खटीक जाति के 

          पासी होने के प्रमाण 


खटीक जाति के पासी होने का सबसे बड़ा प्रमाण है लेखक  विजय सोनकर शास्त्री जी जो खटीक जाति से आते है 

उन्होंने एक पुस्तक लिखी  जो साक्षो पर आधारित है वो पुस्तक है हिन्दू खटीक जाति 


इस पुस्तक के पेज नम्बर 320

जातियों की उपजाति बताई गयी है (974)पर पासी जाति के उप जातियों के बारे में लिखा गया है

पासी जाति की उपजाति में खटीक जाति दूसरे नम्बर पर दर्ज है 


ऐसे और भी बहुत से साक्ष्य मिलते है हमने एक ही साक्ष्य दिखाना उचित समझा की लेख लम्बा न हो जाए 


लेखक : भारत पासी भारशिव

सपोर्ट : दादा पासी 


ब्लॉगर : #भारशिव_पासी_राजवंश

और 

http://bharshivpasirajvansh.blogspot.com/


#महाराजा_सुहेलदेव_पासी

http://www.Rajasuheldevpasi.blogspot.com


फेसबुक पेज:

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पासी इत्तिहास

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महाराजा सुहेलदेव पासी

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बुधवार, 20 जनवरी 2021

#भारशिव वंश #पासी_जाति

 भारशिव वंश ( पासी जाति ) का संक्षिप्त इतिहास

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#भारशिव_वंश_पासी_जाति 

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   "पासी जाति अवध कि शासक जाति रही है " पासी जाति  ( Ruler of Oudh ) के नाम से इतिहास के पन्नों में संकलित है जिनके बारे में कहा जाता है कि वे  11 वीं एवं 12 वी सदी में अवध में बड़े ही शक्तिशाली थे जिनका जीवन संघर्षों में बीता । जिनके किले कस्बे आज भी खंडहरों के रुप देखे जा सकते है एवं  पासी आबादी बाहुल्य क्षेत्र है  जो उनके अतीत के गौरव को दर्शाते है ,जिनके साक्ष्य हमे मुस्लिम एवं ब्रिटिश अभिलेखों में मिल जाते है  भारत देश में  सम्राट हर्षवर्धन 6 ईसवी के बाद  देश कई  छोटे छोटे राज्यों में बट गया कई सारे नए  प्रांतीय राजवंशों का उदय हुआ जिनमे पश्चिम में राजपूत , गुर्जर , सोलंकी, चालुक्य  आदि , उसी तरह  से उत्तर भारत के अवध प्रांत में राजपासी का उदभव हुआ , ये सभी वंश किसी ना किसी प्राचीन भारत के शक्तिशाली वंशो निकले थे , जिनके पराभव के बाद भी उनकी औलादों ने  सही समय आने पर अपनी-अपनी शक्तियों को पुनर्जीवित कर  राजसत्ता हासिल की ,जिसके लिए ओ जाने जाते थे । 

            हम उसी वंश का पता लगाने कि कोशिश करते है और  इतिहास के पन्ने पलटकर बड़ी गूढ़ता से अध्ययन करते है  तो हम पाते है पासी भारत की नागवंश जाति है जिन्होंने उत्तर भारत के अवध में शासन किया  । और हम आज पासी जाति के वंश, नाग- भारशिव वंश के बारे मे विस्तृत चर्चा करेंगें  ।


               [[ ब्रिटिश विद्वान रसेल -1916 ]]    - पासी जाति को द्रविड़ियन जाति  और भारत का मूलनिवासी  aboriginal, inhabitants  माना है  और विद्वानों ने द्रविड़ को नाग जाति माना है  ।   


पासी जाति अवध में केंद्रित रही  है और इसी संबन्ध मे ब्रिटिश विद्वान - [[ Robert vane russell ]]  the tribes and caste of the Central provinces of India V -4 

       

                                    में --( page no 381-385)


[[ Mr. Crook's article on Pasi , And include questions from sitapur ]] ----- पासियों के बारे मे कथन है ---

         " Pasi In the past they were lords of the country ,and that their King regined in the district of Kheri , hardoi ,and unnao . Ramkot , where the Town of bangarmau in Unnao now stands  ,is said to have been on of the their chief strongholds  . The the Last of pasi lords of ramkot ,raja satan ,threw off allegiance to kannauj and refused to pay tribute ."  

         प्राचीन समय में पासी इस देश के राजा कहलाते थे उनके राजा खीरी हरदोई उन्नाव और रामकोट जो बांगरमऊ में आता है कहा जाता है - कि इनके राजा उस समय बड़े ही शक्तिशाली थे ( यानी 12 वीं सदी ) जिन्होंने कन्नौज के प्रति अपनी निष्ठा खत्म करके उनको कर देने से साफ साफ मना कर दिया था । 

         ब्रिटिश  विद्वान  [[ Mr.Elliott ]] कथन है कि उन्नाव जिले में पड़ने  वाला " ramkot was the neighborhood was bangarmau,was the old capital of Pasis " रामकोट पासियों की पुरानी  राजधानी  रहीं है 


    ( यही युद्ध का कारण बना गांजर युद्ध हुआ  1184 AD.)


    उपरोक्त कथन के अनुसार  पता चलता है राजा सातन पासी  12 वीं सदी में बड़े शक्तिशाली बन गए थे और उन्होंने कन्नौज के राजा जयचंद से अपनी निष्ठा खत्म कर दी थी और वही युद्ध का कारण बना । और आपको याद दिला दूं बांगरमऊ प्राचीन समय में नाग जाति का शासन यहां रहा है और यह क्षेत्र आज भी पासी बाहुल्य है -   1852 मैं लंदन में छपे  एक आर्टिकल में  इस बात का जिक्र होता है इस क्षेत्र के पासी बड़े  विद्रोही है है जो अंग्रेजों को लगातार परेशान करते आ रहे थे ।


यह बात उनके आदतों को बयान करता है कि  पासी कभी भी अत्तः नहीं सहन करते  थे वह  स्वतंत्र रहना चाहते थे  यह उनके परपंरा वादी चली आ रहीं  प्रवृति के चलते था  । जिसका बीज सदियों पहले  नाग भारशिवो  ने बोए थे ,  और भारतीय पुरातत्व विभाग  द्वारा  राजा सातन पासी के किले में हुई थी जहां पर एक मोहर प्राप्त हुईं जिसमे ब्राह्मी लिपि में ' 'सिद्धेश्वर' लिखा था और  अनेकों अनेक शिवलिंग कि मूर्तियों की प्राप्त हुई थी । और भारत में शिव मत की शुरुआत मजबूती से 2-3 ईस्वी में  नाग भारशिवो द्वारा कि गई । और विद्वानों ने पासी जाति को बौद्ध और शैव मत दोनो कहा है 


[[ अवध गजेटियर में साफ साफ कहा है  "  प्राचीन समय में पासियों के पुरखे बौद्ध मत के थे लेकिन जल्दी ही उन्होने बौद्ध   मत का परित्याग कर ब्राह्मण धर्म की ओर आकर्षित हुए " ]] 


    Note ✓  " This is most important thing "  


यह घटना सीधे तौर पर उसी समय काल को संकेत करते हुए दिखाई देती है जब कुषणो के आतंक से परेशान होकर नाग जाति के लोगों ने शिव का भार अपने  कंधे पर उठाकर कुषणों को देश के बाहर खदेड़ने की  प्रतिज्ञा कि थीं यानी  उस समय एक नए दर्शन ( philosophy ) का सृजन हुआ । और हो ना हो उसी समय नाग जाति के लोग ब्राह्मण धर्म के तरफ़ थोड़ा झुकाव हुआ हो , तभी भारशिव ( नाग वंश ) लोगो का वर्णन वाकटक के शिलालेख और ताम्रलेख में मिलता है  और वकाटक वंश को विद्वान ( ब्राह्मण वंश ) मानते है , लेकीन जबतक भारशिव शक्तिशाली रहें तब तक ब्राह्मण धर्म हावी ना हो सका । और तो और  भारशिव के तुरन्त बाद वकाटक वंश का शक्तिशाली बनना हमे यही सोचने पर मजबूर करता है  वकाटकों ने  सत्ता भारशिव से ही ली थी इसमें दो राय नहीं है , भारशिव नाग पर प्रकाश डालने वाले प्रख्यात विद्वान के.पी जयसवाल जी का भी यही कथन है  उसके बाद नाग भारशिव वंश का पतन होना शुरु हुआ ।   

           

पासियों का बौद्ध धर्म का परित्याग कर ब्राह्मण धर्म की ओर जाना जिसे ब्रिटिशो ने ब्राह्मण धर्म बताया है दरसअल वह शैवमत था  , क्योंकि ब्रिटिश विद्वानों ने पासी जाति की पूजा पद्धति ब्राह्मण से नहीं मिलती है इसका भी उल्लेख किया है जो वास्तव में सच है  एवं  पासी जाति  शिव को मानने वाला बताया  है और वास्तव में आज भी पासी जाति भगवान शिव में आस्था रखती आयी । इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है उनमें प्राचीन परंपरा आज भी जिंदा है 


और अवध गजेटियर में  जिक्र वह वाक्य उसी घटना के समय काल का बोध कराती नजर आती है  

                मै  इस बात को बड़ी मजबूती से कहता हूं  पासी प्राचीन समय के नाग भारशिव  है पासी आधुनिक नाम है इसका समर्थन एक तो उनका उसी जगह पर होना, उनका शासन , उनकी नाग जाति के लिए बताई गई आदतें  एवं  अवध गजेटियर में बताया गया उनके बौद्ध धर्म का परित्याग जैसा ऊपर बता चुका हूं

  

          मैं इस बात की टिप्पणी लोगो को किसी भी धर्म या संप्रदाय के तरफ मोड़ने के लिए नही अपितु इसलिए कर रहा हूं  कि उपलब्ध साक्ष्यों में इस बात का जिक्र है  पासी जाति के अवध  में जितने  भी किले हैं वहां पर शिव से संबंधित मूर्तियां एवं आकृतियां जरुर मिलती है ।  


( महाराजा सातन पासी का किला जहां है प्राचीन समय में इस क्षेत्र को बांगरमऊ कहा जाता था )


                     जिसका सबसे बड़ा उदाहरण राजा सातन पासी ( सातन कोट )  की खुदाई में मिले मोहर पर अंकित  'सिद्धेश्वर ' जो शिव को समर्पित है शिव को ही सिद्धेश्वर कहते है  और ऐसा नहीं है कि सिर्फ शिव की मूर्तियां मिलती हैं और यहीं नहीं  यहां पर बौद्ध कालीन  प्रमाण मिलते हैं जबकि बौद्ध धर्म भारशिव से पहले यहां पर थीं तो बुद्ध की आकृतियां ज्यादा मिलनी चाहिए थी ? लेकीन  बुद्ध की अपेक्षा  शिवलिंग / मूर्तियां  आदि के  प्रचुर मात्रा में मिलते है  इसका मतलब यह है कि पासी जाति के पुरखो  ने बौद्ध धर्म का परित्याग करके शिव  में अपनी आस्था  जगाई थी  और यह आस्था  कुषाणो के बौद्ध धर्म के दो टुकड़े करने के बाद ही जागा, जब महायानी बौद्धों ने भारतीयों पर अत्याचार करना शुरु किया तब हमारा बौद्ध धर्म भी विघटित हुआ , यहीं कारण है उस समय भारतीय जनता इतनी व्याकुल हो गई थी कि उन भारतीयों को उन दुष्टों से मुक्ति दिलाने के लिऐ नाग जाति के लोगो अदम्य साहस का परिचय दिया  ।  शिवलिंग का भार अपने कन्धे पर उठाया और प्रतिज्ञा की और कुषाण लोगो को काबुल तक खदेड़ कर कूषणो के आतंक से भारतीय जनता को मुक्ति दिलाई , फिर 10 अश्वमेध यज्ञ किए  भारशिव कहलाए और भारशिव वंश कि स्थापना की ।  भारशिव दरसअल नागो के लिए एक  उपाधि थी , लंबे समयांतराल बाद भी उत्तर भारत मे वह भारशिव  शब्द विकृत रुप से  भर  रूप में तब्दील हुईं और अवध मे कई कोने भर नाम से प्राचीन जगहों का नाम आज भी है  जैसे  जैसे भरावन , भरखनी,, छोटा भरवारा, बड़ा भरवारा  ,भरवारी, भरहे मऊ आदि इन सभी जगह पर 90% पासी जाति की आबादी है जो उनके अतीत के गौरव को दर्शाती है ।  


और अवध में भर शब्द पासी जाति के लिए जोड़ा जाता है 

 

( जिसकी फोटो मै पोस्ट कर रहा हूं बाकायदा उस ताम्रलेख के साथ हिंदी अनुवाद और ब्रिटिश दस्तावेजों से निकाल कर )


नोट✓= नीचे अपलोडेड फोटो सिर्फ़ भारशिव से संबंधित  है


भारत देश में भार-शिव का उद्भव मध्य भारत और उत्तर भारत में हुआ है  और उत्तर भारत के अवध क्षेत्र में जहां नागों की राजधानी रही है जिसमें से बांगरमऊ प्रसिद्ध है एवं भारशिव के जगहों पर पासी जाति बाहुल्य आज भी है जो उनके प्राचीनतम निवास एवं उनके गौरवमई अतीत को दर्शाती है । और बंगार मऊ के बारे मे ऊपर चर्चा कर चुका हूं  

#भारशिव_वंश_पासी_जाति 


अब तक आपने यह जान लिया होगा कि की नाग जाति की उपाधि भारशिव है यानि नागो के लिए भारशिव नया नाम था   आपके मन मे यह सवाल उठता होगा क्या किसी विद्वान् ने पासी  जाति को नाग कहा है 

              तो उसका उत्तर है हां ?


[[अमृतलाल नागर ]] - 

                          जी ने पासी जाति को असुर/ नाग एकदा नैमिषारण्य में  कहा है उसका मुख्य कारण था , इतिहास में मिले साक्ष्यों के आधार पर जैसे  नाग जाति ज़मीनो के निचे आवास बनाने में परांगत और नाग जाति धनुष तीर चलाने में निपुण थे और दारू का सेवन करती थे वहीं लक्षण  पासी जाति  में दिखाई देती है पासी धनुष तीर चलाने में और सुरंग खोदने में निपुण रहें यह सारे लक्षण  पासी जाति के लोगो में 1857 में देखे गए उनके यह दुर्गुण युद्ध के समय सगुण बन जाते थे और 1857 में पासी जाति के लोगो ने रेजीडेंसी और बेलीगरद में सुरंगे बिछा कर अंग्रेज़ो के दांत खट्टे कर दिए थे , क्योंकि अवध में सुरंग खोदने की कला पासियों को भलीभांति आती थी और दूसरी जाति यो  का नाम सुरंग खोदने में  बड़ी मुश्किल से ही कहीं दिखाई देता है यह सारी आदतें पासी जाति के लोग परम्परा गत तौर पर बखूबी से जानते है थे यहीं कारण था और लोगो में यह तकनीक नहीं दिखाई देती थीं  और anthropology के हिसाब से भी पासी जाति के लिए यह लक्षण  बिलकुल वैसे हि नज़र आते थे जैसे नाग जातियों के बारे मे वर्णन मिलता है यही कारण रहा होगा कि अमृतलाल नागर जी पासी जाति को नाग /असुर के समकक्ष माना है


[[ ऊपर आप सभी नाग/भारशिव /पासी का एक क्रम आप समझ गए होंगे  ]]  


अब हम समझने की कोशिश करेगे #भारशिव कौन थे और #भारशिव_राजवंश क्या था  ।


Introduction bhar-shivas: 


[[ भारशिव कौन थे  ]] 

                               भारशिव लोग प्राचीन नाग थे जिनके लिए भारशिव एक उपाधि थी  भारशिव के बारे मे विस्तृत जानकारी पहली बार हमे  

          वकाटक वंश के राजाओं द्वारा लिखित अभिलेखों और ताम्रलेखो में मिलती है , उन अभिलेखों की खोज 1840-1870 के सशक्त में ब्रिटिशों द्वारा की गई।  जिसका वर्णन  [[ inscription of the early Gupta's and the successor ]]   by john faithfull fleet  द्वारा 1880 में किया गया है 

              इसके बाद भारशिवो ऊपर विस्तृत वर्णन  श्री के. पी. जयसवाल जी ने 1936 में [[ history of India 150.AD-350.AD ]] जिसका हिंदी संस्करण [[ भारत वर्ष का अंधकार युगीन इतिहास  ]]  में  बाकायदा किया है  ।


         [[ Gupta inscription page no ,236-241 ]] जिसकी फोटो अपलोड की है कृपया उसे देखे ।


Introduction bharshiva : भारशिव कौन ? 

              [[ ताम्रलेख में श्लोक वर्णन ]]

 chhamak प्लेट जो वकाटक राजा प्रवर्सेन द्वितीय के लिए जाना गया है उसमे भारशिव का संक्षिप्त इतिहास 


भारशिव :  श्लोक =  अंशभार सन्निवेशित शिवलिंगोदवहन , शिव सुपरितुष्टानाम समुत्पादित राजवंशनाम् पराक्रम अधिगत : भागीरथी : अमल जल मुरघाभिष्कतानाम् दशाश्वमेघ अवमृथ स्नानानाम् भारशिवानाम्


   अर्थात :  अपने कंधों पर शिवलिंग का भार वाहन करके शिव को सुपरितुष्ट करके जो राजवंश पैदा हुआ उस भारशिव वंश ने पराक्रम से विजय प्राप्त कर , गंगा जल से अवभृत से स्नान कर गंगाजल से ही अपना राज्यअभिषेक करवाकर दस अश्वमेध यज्ञ किए थे। By के. पी जयसवाल [[ भारत वर्ष का अंधकार युगीन इतिहास पृ . 10 ]]  


    इस कीमती ताम्रलेख से भारशिव के उस राजवंश का पता चलता है जिसने  अपने बाहुबल से 10 अश्वमेध यज्ञ किए  अर्थात नाग वंश के उन लोगों ने, जिन्होनेअपने पराक्रम से ऐसे विजय हासिल की  और एक ऐसे राजवंश की स्थापना की जिसका अर्थ ही त्याग और बलिदान था जो इस देश धर्म की रक्षा कर सकें ।   


     उस राजवंश से पासी जाति का क्या  संबन्ध है ? 


 सबसे पहले हम समझेंगे कि राज = वंश  क्या जिक्र है 


अब इस श्लोक कों देखे तो उसमे [[ राजवंशनाम‌् ]] आया है फिर [[ भारशिवनाम‌् ]]  यानी  भारशिवो का राजवंश ।


इसी के परिपेक्ष्य में इतिहास दो शब्द बड़े महत्वपूर्ण है जैसे 


  राज +पुत्र = राजा का पुत्र अर्थात राजपूत 

  राज+ वंश  = राजा का वंश अर्थात राजवंशी


जिसमे राजपूत वर्तमान में ( स्वर्ण क्षत्रिय )  के लिए होता है 

और राजवंशी अवध में ( राजपासी ) के लिए यानी पासी का राजवंश । अंग्रेजो के समय हुऐ फिल्ड सर्वे में हरदोई और सीतापुर के पासी जाति के लोग  राजवंशी और राजपासी दोनो कहते मिले थे ,  रजपासी/राजवंशी  दोनों एक समान है  

  

अवध गजेटियर में इस बात कि पुष्टि होती है की पासी जाति के आगे राज लगा है जिसका सीधा सा अर्थ अतीत में इनकी  राज सत्ता रहीं होगी , ब्रिटिश विद्वान् p.carnegy 1860 के दशक में हरदोई सीतापुर  राजपासियो को बड़े करीब से अध्ययन करते है और Mr. Crook : 

                          भी यही बात कहते है [[  राजपूतों और मुसलमानों के आक्रमण से पहले उत्तर भारत में पूर्व में चेर मध्य मे भर और पश्चिम में राजपासियो का शासन रहा है ]] 

                                      और अवध में राजपासी और भर एक ही लोगो के दो दो नामावलियां है ।   


Lucknow settelment report में  सीतापुर में 'पासी राज' होने की पुष्टि होती है जो अकबर के समय तक बरकरार रहा और [[ पासी राज ]] सीतापुर , हरदोई के पश्चिम जिलों में यहां तक की फरुखाबाद तक फैला था इसका सुंदर उदाहरण अवध गजेटियर में  देखने को मिल जाता है ।   


                [[ भारशिव राजवंश या राजपासी ]]


उपरोक्त दी गई जानकारियों को आप सभी ध्यान में रखते हुए साक्ष्यों के तालाश में होंगे इसलिए मै आप सभी को साक्ष्यों के आधार पर हि जानकारी दे रहा हूं 

 

भारशिव शासन 150-350 ई. तक माना गया है भारशिव के बाद वकाटको ने , उसके बाद गुप्तो ने  इस देश का शासन संभाला  {{ नाग-भारशिव = वकाटक = गुप्त }}     


फिर जब इनका पराभव हुआ तो यह मौके के सही तलाश में रहने लगे  । सम्राट  हर्ष वर्धन के बाद  अवध में यह अपनी शक्ति को पुन: संगठित करने में लगे ऐसा अनुमान लगाया जाता है ।  और जब जानकारी होती है तब 918 ई में राजा त्रिलोक चंद पासी ने सम्राज्य कि पुन:  नीव रखी  । 


[[ भारशिव इतिहास ]] :  तीसरी सदी . में नाग वंश के वह लोग जिन्होंने शिव का भार अपने कंधों पर वाहन करके शिव को सुपरितुष्ट करके एक नए राजवंश की नीव डाली थी वहीं वंश भारशिव वंश कहलाया । भारशिव वंश भारत देश में उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में फैला भारशिवो ने जिस वंश को खड़ा किया , आगे चलकर वही ( राजवंश ) अवध में ( राजपासी ) के नाम से जग विख्यात हुए जिन्होंने 10 - 12 वी सदी तक अवध में शासन किया ।


  [[ प्रसिद्ध इतिहासकार डॉनवल वियोगी कहते हैं ]]  : -कि भारशिव लोग विंध्य क्षेत्रों में भर और अवध में पासी जाति के नाम से जाने गए । और अवध में भर , पासी जाति की 14 उप जातियों में एक है । 

 

जिस प्रकार से नागो ने अपने पराक्रम से एक राजवंश की स्थापना कर भारशिव नाम दिया  , भारशिव  नागो के लिए एक उपाधि थी जो बाद में  इसी नाम जानें गए 


             तो इसकी जानकारी हमें कहा मिलती है कि राजवंशी या राजपासी  का एक ही समन्वय है ?


               ==  तो  उत्तर है  हां मिलती है =


   [[ Rajvanshi /Rajpasi  ]] इसके बारे अपने विचार सबसे पहले  1873 में Mr. H .H butts साहब ने व्यक्त किया है [[ Report of the land revenue setteltment 

Of the lucknow district .1873,p. xxiv ]]  


[[ A bhars daynasty ]]  [[ Pasi Kingdom ]] 


Note ✓  जिस समय यह बुक  1873 में शोध के बाद लिखी जा रही थी उस समय भारशिवो का संक्षिप्त इतिहास बहुत कम पता था ना के बराबर ,1888 में gupta inscription में भारशिव के बारे मे विस्तृत जिक्र किया गया था , उससे पहले लिखे गए bhars शब्द सीधे भारशिवो के लिए जोड़ा जाना चाहिए  ना कि तथाकथित जाति जो पूर्वी उत्तप्रदेश में इस नाम से मिलते जुलते जान पड़ते है यहीं बात के. पी. जयसवाल ने भी कहा है  ।  यह एक सुधार नव इतिहासकारों को करना चाहिए तभी उसकी गूढता में छिपे रहस्य को जान पाएंगे ।  


[[ A Bhars Dynasty 918 ]]


This chief fixed upon Baraich as his seat of empire, and lead a powerful army against Rájah Bikrampál of Delhi, whom he defeated, and dispossessed of his kingdom. 


" राजा त्रिलोक चंद ने 918 में  साम्राज्य की पुन स्थापना की , इस प्रमुख ने  बहराइच को अपनी राजधानी बनाया और शक्तिशाली सेना एकत्रित की और दिल्ली के शासक विक्रमपाल हराया और उसे  उसके राज्य तक खदेड़ दिया" ।


Tilok Chand is said to have been a worshipper of the sun. Near Baraich is a temple in his honour called Báláark,-Ark is the Sanscrit for sun-and he wished in imitation of the Súrajbans to give a new and better name to his tribe. He accordingly called them the Arkbans, and to his own immediate family he gave the title of Ark-ráj- bansí.  


अर्थात :  तिलोकचंद के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह सूर्य देवता के पुजारी थे। बहराइच में उनके सम्मान में बना बलार्क  नाम का सूर्य मंदिर है आर्क का  संस्कृत नाम सूर्य से है। 

 उन्होंने सूरजबंसियो की तरह अपनी जाति को  एक नया और बेहतर नाम देने की इच्छा जताई । और इसी के अनुसार उन्होंने अपने जाति के लोगों को अर्क बंशी नाम दिया तथा अपने परिवार के लोगों को  अर्क-राजबंशी का उपनाम दिया । 


Later on when they lost all power they became known as the Arakhs and Ráj-bansís, which latter word in the usual process of decay of language, and the loss of its earlier meaning, became changed to Rajpasia. Aut ex re nomen, aut ex rocabula fabula. Native tales mostly depend upon the name, and his ingenuity seems here to surpass itself, bans has become pásí,–not possible by any etymological law of change-and he has lost sight of his Bhar dynasty in order to invent an origin for the word Rajpasía.  


बाद में शक्ति विहीन हो  जाने के पश्चात  आर्क-राजवंशी  2 शब्दों में विभक्त  हो जाने पर अर्क और राजबंशी दो अलग-अलग  नाम से जाने जाने लगे ।  जिसमें से राज बंशी समय के अनुसार भाषा में परिवर्तन के कारण राजपसिया में परिवर्तित हो गया।  बंश बदलकर पासी हो गया ऐसा किसी भी व्याकरण शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार असंभव है।  लोगों ने राजपासी शब्द के उत्पत्ति की खोज करने के चक्कर में भर नामक साम्राज्य  उनकी दृष्टि से ओझल हो गया। 


  ( अर्थात रजपासी के प्रचलन में भर शब्द कम या विलुप्त हो गया यानी एक समय तक एक शब्द का बने रहना उसके बाद उसकी जगह दुसरा शब्द प्रचलन में आ जाना  ) 


निष्कर्ष :  उपयुक्त पैराग्राफ के अध्ययन से यह बात समझ आती है  राजा त्रिलोक चंद ने नाम के आगे एक नया उपनाम / उपाधि जुड़ चुका था  वह है राजपासी दूसरी चीज यह थीं कि राजा त्रिलोक चंद पासी  उसी भारशिव राजवंश के थे जो अपने समय से  600 साल पीछे यानी दूसरी से तीसरी सदी में शक्तिशाली थे , राजा त्रिलोकचन्द पासी ने अपने वंश  के लोगो कि विखंडित शक्तियों  को मजबूत कर एक बार पुन : राजवंश खड़ा किया , पूरे अवध , दिल्ली , पहाड़ी क्षेत्रों  को जीत कर बहराइच  को अपनी  राजधानी स्थापित किया  , राजा त्रिलोक चंद पासी बहराइच से  राज करता था ।

यानी राजा त्रिलोक चंद पासी 918 ई में ही  अपने जाति या वंश का नाम बदलकर नया नाम रखने की इच्छा जताई जिसके फलस्वरूप राजबंसी/रजपासी नाम प्रचलित हुआ और इसलिए हरदोई,सीतापुर, खीरी , बहराइच की जो बेल्ट है यहां पासी आज भी खुद को राजपासी और राजवंशी ही कहलाना पसन्द करते है ऊपर से हरदोई के फील्ड सर्वे मे पासीयो ने ख़ुद राजा त्रिलोक चंद का वंशज कहा था 150 साल पहले अगर पासी यह कह रहे थे तो इसमें दो राय नहीं है राजा त्रिलोकचंद पासी थे और वह भारशिव थे  यह भिन्न भिन्न नामावलियां है एक ही जाति के लिए और 

    भारशिव/ राजपासी  

अवध में पासी ही भारशिव वंश है क्योंकि इनमें ही सारी शब्दावलिया समाहित है ।


यह सिलसिला बिलकुल  उसी तरह से था जैसे  नागो ने भारशिव राजवंश की स्थापना की उसी क्रम में इससे हमे यह पता चलता है  कि 918 ई राजा त्रिलोक चंद अपने परिवार और वंश के लिए एक नया नाम राजपासी  रख लिया , बाकी जाति के लोग अपने पुराने नाम भारशिव जों अपभ्रंश होकर भर नाम से बने रहे है  और यह सभी पासी जाति के अंतर्गत है    अवध में जहां जहां भर नाम से किले खंडहर है जो भारशिवो से संदर्भित रहा है  वहां आज भी पासी जाति बाहुल्य है     #भारशिव_वंश_पासी_जाति_इतिहास 

 

#Short_History_Pasi_caste :  तीसरी सदी . में नाग वंश के वह लोग जिन्होंने शिव का भार अपने कंधों पर वाहन करके शिव को सुपरितुष्ट करके एक नए राजवंश की नीव डाली थी वहीं वंश भारशिव वंश कहलाया । भारशिव वंश भारत देश में उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में फैला भारशिवो ने जिस वंश को खड़ा किया , आगे चलकर वही ( राजवंश ) अवध में ( राजपासी ) के नाम से जग विख्यात हुए जिन्होंने 10 - 12 वी सदी तक अवध में शासन किया । प्रसिद्ध इतिहासकार डॉनवल वियोगी कहते हैं : -कि भारशिव लोग विंध्य क्षेत्रों में भर और अवध में पासी जाति के नाम से जाने गए । और अवध में भर , पासी जाति की 14 उप जातियों में एक है ।  

पासी जाति अवध की प्राचीन भारशिव है  [[ ब्रिटिश विद्वानों  ने भी पासी जाति  की उत्पत्ति भारशिवो से है यह बताया है ]]  


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   [[ बदलते हुए समय चक्र में भारशिव वंश पासी जाति  ]]

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         नाग , नवनाग , भारशिव , राजपासी ,पासी 

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#भारशिव_जाति_अवध_की_प्राचीन_भारशिव
#बदलते_हुऐ_समय_चक्र_में_भारशिव_वंश_पासी_जाति
#bharshivas_of_pasi_caste
#bharshiv #Pasi #caste #Pasi_history
#rajpasi #Rajpasiking

#अवध_में_पासी_जाति_भारशिव


Articles by :


*Kunwar Pratap Rawat*

BBau university Lucknow

(History p.g )


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बुधवार, 4 नवंबर 2020

#भारशिव  राजा #वीरसेन

 नाग कुल के शासक नव नाग ने उत्तर भारत में गंगा तट पर कान्तिपुर विंध्याचल मिर्जापुर में धार्मिक अनुष्ठान में शिवलिंग को अपने कन्धे पर उठा लिया जिसके कारण भारशिव नाम से एक नया राजवंश उदय हुआ भारशिवो का साम्राज्य मालवा,ग्वालियर,बुंदेलखंड और पूर्वी पंजाब तक फैला था। और इन्ही भारशिवो ने कुषाणों के राज्य की नींव हिला दी


#कुषाणों को भारत से भगाने वाले #भारशिव  राजा

1 नवनाग (भारशिव वन्स के जनक कहे जाते है )

140 ईo से 270 ईo तक

2 वीरसेन (भारशिव)170 ईoसे 210 ईo तक

3 #भीम नाग (भारशिव)210 ईo से 250 ईo तक

4 देव नाग (भारशिव)311 ईo से 340 ईo तक

5 भवनाग (भारशिव )315 ईo से 340 ईo तक

आदि #राजाओ ने अपने पराक्रम का बल दिखाया था

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लेकिन भारशिव राजाओं में सबसे प्रसिद्ध और सक्तशाली राजा वीरसेन था। कुषाण अपना राज्य विस्तार भारत में कर रहे थे तब कुषाणों के रस्ते का काटा भारशिव राजा वीर सेन था #महाराजा वीरसेन भारशिव पासी कुषाणों को परास्त करके 10 अश्वमेध यज्ञों का सम्पादन किया था और अपने परम्परा को बढ़ाते हुए कंधे पर शिवलिंग धारण किया और अपने पराक्रम के बल पर भारशिवो ने राज सत्ता कायम कर लिया उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद ज़िले में एक शिलालेख मिला है, जिसमें इस प्रतापी राजा का उल्लेख है।

इस प्रतापी राजा के सिक्के भी प्राप्त हुए है

पद्मावती,

कान्तिपुरम, मथुरा ,विदिशा, भारशिव राजाओ की राजधानीया थी जो समय समय पर बदलती रही

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278 ई.के लगभग पाटलिपुत्र से भी कुषाणों का शासन समाप्त हुआ। इसका श्रेय विंध्यशक्ति को जाता है।

नोट : विंध्यशक्ति को लेकर लेखक खुद कन्फ्यूज है कई लेखक मानते है कि विंध्यसक्ति कोई राजा था जबकि कई लेखक अपनी लेखनी में लिखते है कि विंध्यसक्ति एक माहसंघ था

कुषाणों का विरोध करने के लिए भारशिवो द्वारा इस महासंघ की स्थापना की गयी थी जिसमे अनेक भारशिव नाग राजाओ ने भाग लिया था और उस महासंघ से जो शक्ति उतपन्न हुई उसका  नाम विंध्यासक्ति दिया गया और इस विंध्यसक्ति का सेनापति ब्राह्मणों को बनाया गया

जिन्होंने भारशिवो नागों के साथ मिलकर कुषाणों से लड़ाइयां लड़ी जब सहसा कुषाण साम्राज्य परास्त हो गया तब भारशिव नरेशो ने 10 अश्व मेघ यज्ञ किया ये यज्ञ कासी के नगवा नामक स्थान पर सम्पन्न हुए थे और भारशिवो के शव प्रोहित ब्राह्मण ही थे और ब्राह्मणों ने ही नाग नरेश भारशिवो का राज्याभिषेक गंगा के पवित्र जल से किया था

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(पुस्तक भारत की जाती प्रथा )के पेज 148 पर कह गया है कि भारशिवो ने एक महासंघ की स्थापना की थी जिसमे अनेक भारशिव नाग राजाओ ने भाग लिया था लेकिन उस महासंघ का नाम नही बताया गया 

पुस्तक (भारशिव राजवन्स गौरव) के पेज नम्बर 54 पर 

लेखक (रामदयाल वर्मा )इसकी पुष्टि करते है

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अब मैं भी कह सकता हु की उस महासंघ का नाम विंध्यसक्ति ही था जो

#भारशिव_राजाओं की प्रेरणा से ही विंध्यशक्ति ने पाटलिपुत्र से मुरुण्ड शासकों का उच्छेद कर उसे #कान्तिपुर के #


साम्राज्य के अन्तर्गत कर लिया था। मगध को जीत लेने के बाद भारशिवों ने और अधिक पूर्व की ओर भी अपनी शक्ति का विस्तार किया। अंग देश की राजधानी चम्पा भी बाद में उनकी अधीनता में आ गयी। वायु पुराण के अनुसार नाग राजाओं ने चम्पापुरी पर भी राज्य किया था।

पर मगध और चम्पा के भारशिव लोग देर तक पाटलिपुत्र में शासन नहीं कर सके। जिस प्रकार हरियाणा - पंजाब में यौधेय, आर्जुनायन आदि गण स्वतंत्र हो गये थे, वैसे ही इस काल की अव्यवस्था से लाभ उठाकर उत्तरी बिहार में लिच्छवि गण ने फिर से अपनी स्वतंत्रत सत्ता स्थापित कर ली थी।

भारशिव ( पासी )नरेशो ने नीमसार में जन जागरण यज्ञ भी  किया और कुषाणों के #बौद्ध_धर्म को #भारत में #पासियों ने नकार दिया  हिन्दू (शैवधर्म )का विस्तार किया

पुस्तक (भारशिव राजवन्स गौरव ) के पेज 45 पर रामदयाल वर्मा जी लिखते है 

जब कोई #राजवन्स किसी से हार जाता है तो उसकी जाती उसका धर्म भी हार जाता है कुषाणों के सत्ता में आने से बौद्ध धर्म भारत में पैर पसारने लगा लेकिन भारशिव (पासी) नरेश राजा वीरसेन के नेतृत्व में  कुषाणों को परास्त करके चीन के सीमा तक खदेड़ दिया और बौद्ध धर्म हिन्दू (शैवधर्म) से हार गया हिन्दू शैव धर्म जीत गया और इस तरह भारत में बौद्ध धर्म का विस्तार रुक गया 

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भारशिव राजा मित्र नंदी अपनी मुद्राएँ चलाई उन सिक्कों पर अपना चिन्ह ताड अंकित किया 

जो ताड का पेड़ भारशिव  राजाओ का झंडे का चिन्ह था ताड आज भी #पासियों से  सबंधित है बेवसाय के रूप में  

और #उत्तर_प्रदेश की अनुसूचित जाति की लिस्ट में पासी ताडमाली के नाम से अंकित है और पद्मावती जो भारशिव राजाओ की राजधानी थी उनकी दीवारों पर ताड के पेड़ बने हुए थे तो इस तरह भारशिव वन्स पासियों से समन्धित है इसके प्रमाण मिलते रहते है  

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#पासी_जाती के महिलाओं द्वारा #विवाह के उत्सव पर सदियों से यह गीत गाया जाता रहा है


घर में ही गंगा घर में ही जमुना

घर में ही पंच पराग (प्रयाग)

जल कम्पै जल लहरि कम्पै

कम्पै कुषाण के गात

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इस गाने का व्यावहारिक अर्थ है

गंगा और जमुना पर हमारा अधिकार है। जैसे घर पर मनुष्य का पूर्ण अधिकार होता है

हमारी #जाती भारशिव का नाम सुनते ही कुषाणों के सरीर की रूह कांप उठती थी जैसे जल और जल की लहरे कांपती है

यह गीत 

पुस्तक :भारशिव राजवन्स गौरव  के पेज 30  से लिया है 

लेखक :रामदयाल वर्मा 

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लेखक : नवल वियोगी 

प्रफेसर :ऍम अनवर अन्सारी पुस्तक : (उत्तरा पथ के नाग शासक तथा शिल्पकार आंदोलन का इतिहास)

 पेज 86 पर लिखते है  

हम जानते है कि #पद्मावती के #भारशिव जो मूल रूप से  तक्षशिला के टाक राज परिवार के संतान थे जब उनसे सब कुछ छीन गया तो  उनकी एक साखा पासी बन गयी दूसरी भर बन गयी


लेखक :रामदयाल वर्मा 

पुस्तक :(भारशिव राजवन्स गौरव) के पेज 39 पर इसकी पुष्टि करते है 


लेखक :(डाक्टर योगेश प्रवीन)

पुस्तक: ( #लखनऊ के मोहल्ले और उनकी सान)

पेज 11 पर लिखते है कि हिमालय के तराई से आकर लखनऊ पर भारशिव वन्स के भर और राजपसियो ने अधिकार कर लिया 

शोध करता रघुनाथ पासी उर्फ़ (भारत पासी)

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

महाराजा #सुहेलदेव पासी Maharaja #Suheldev Pasi

राष्ट्ररक्षक : महाराजा सुहेल देव पासी 1001 ई . से 1034 ई.
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पासी राजा सुहेल देव को अपनी किताब में उतारने के लिए मै डॉ मेजर परशुराम गुप्त जी को कोटि कोटि धन्यवाद देता हूं 

जिसमें का थोड़ा अंश मै आपको सामने लिख रहा हूं हूबहू उनकी लिखित लाइन

लेखक = डॉ मेजर परशुराम गुप्त
पुस्तक =  राष्ट्रीय गौरव सम्राट हेम चन्द्र `विक्रमादित्य`

1001 ई. 1034 ई.तक महमूद गजनवी ने भारतवर्ष को लूटने की दृष्टि से 17 बार आक्रमण किया तथा मथुरा , कन्नौज व सोमनाथ के अति समृद्ध मंदिरों को लूटने में सफल रहा । सोमनाथ की लड़ाई में उसके साथ उसके भानजे सैयद सालार समूद गाजी ने भी भाग लिया । #1030 ई . में महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में इसलाम का विस्तार करने की जिम्मेदारी समूद ने अपने कंधों पर ली , लेकिन 10 जून , #1034 ई . को बहराइच की लड़ाई में वहीं के शासक महाराजा सुहेल देव पासी के हाथों वह डेढ़ लाख जेहादी सेना के साथ मारा गया । इस्लामी सेना की इस पराजय के बाद भारतीय शूरवीरों का ऐसा आतंक विश्व में व्याप्त हो कि उसके बाद आनेवाले 150 वर्षों तक किसी भी आक्रमणकारी को भारतवर्ष पर आक्रमण करने का साहस ही नहीं हुआ । ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार श्रावस्ती नरेश राजा प्रसेनजित ने बहराइच राज्य की स्थापना की थी , जिसका प्रारंभिक नाम भरवाइच था । इस कारण इन्हें ' बहराइच नरेश ' के नाम से भी संबोधित किया जाता था । इन्हीं महाराजा प्रसेनजित को माघ माह की बसंत पंचमी के दिन 990 ई . को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई , जिसका नाम सुहेल देव रखा गया । अवध गजेटीयर के अनुसार इनका शासन काल 1027 ई . से 1077 ई . तक स्वीकार किया गया है । वे जाति के पासी थे , राजभर अथवा जैन , इस पर सभी एकमत नहीं हैं । महाराज सुहेल देव का साम्राज्य पूर्व में गोरखपुर तथा पश्चिम में सीतापुर तक फैला हुआ था । गोंडा , बहराइच , लखनऊ , बाराबंकी , उन्नाव व लखीमपुर - इस राज्य की सीमा के अंतर्गत समाहित थे । इन सभी जिलों में राजा सुहेल देव के सहयोगी पासी , राजभर राजा राज्य करते थे , जिनकी संख्या 21 थी । ये थे 1. रायसायब , 2. रायरायब , 3. अर्जुन , 4. भग्गन , 5. गंग , 6. मकरन , 7. शंकर , 8. करन , 9. बीरबल , 10. जयपाल , 11. श्रीपाल , 12 , हरपाल , 13. हरकरन , 14. हरख , 15. नरहर , 16 . भल्लर , 17. जुधारी , 18. नारायण , 19 , भल्ला , 20. नरसिंह तथा 21. कल्याण । ये सभी वीर राजा महाराजा सुहेल देव के आदेश पर धर्म एवं राष्ट्र - रक्षा हेतु सदैव आत्मबलिदान देने के लिए तत्पर रहते थे । इनके अतिरिक्त राजा सुहेल देव के दो भाई - बहरदेव व मल्लेदव भी थे , जो अपने भाई के ही समान वीर थे तथा पिता की भाँति उनका सम्मान करते थे ।

सैयद सालार मसूद गाजी  क्रूर आक्रांता एवं लाखों कि सेना 
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महमूद गजनवी की मृत्यु के पश्चात् पिता सैयद सालार साहू गाजी के साथ एक बड़ी जेहादी सेना लेकर सैयद सालार मसूद गाजी भारत की ओर बढ़ा । उसने दिल्ली पर आक्रमण किया । एक माह तक चले इस युद्ध ने सालार मसूद के मनोबल को तोड़कर रख दिया । वह हारने ही वाला था कि गजनी से बख्तियार साहू सालार सैफुदीन अमीर सैयद एजाजुद्दीन , मलिक दौलत मियाँ , रजव सालार और अमीर सैयद नसरूल्लाह आदि एक बड़ी घुड़सवार सेना के साथ मूसद की सहायता को आ गए । पुनः भयंकर युद्ध प्रारंभ हो गया , जिसमें दोनों ही पक्षों के अनेक योद्धा हताहत हुए । इस लड़ाई के दौरान राय महीपाल व राय हरगोपाल ने अपने घोड़े दौड़ाकर मसूद पर गदे से प्रहार किया , जिससे उसकी आँख पर गंभीर चोट आई तथा उसके दो दाँत टूट गए ।हालांकि यह दिनों वीर थे लड़ते शहीद हो गए  हालाँकि ये दोनों ही वीर इस युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए, लेकिन उनकी वीरता व असीम साहस अद्वितीय था । 

मेरठ और कन्नौज के राजाओं का  झुकना 
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मेरठ का राजा हरिदत्त मुसलमान हो गया तथा उसने मसूद से संधि कर ली । यही स्थिति बुलंदशहर व बदायूँ के शासकों की भी हुई । कन्नौज का शासक भी मसूद का साथी बन गया । अत : सालार मसूद ने कन्नौज को अपना केंद्र बनाकर हिंदुओं के तीर्थ स्थलों को नष्ट करने हेतु अपनी सेनाएँ भेजना प्रारंभ किया । इसी क्रम में मलिक फैसल को वाराणसी भेजा गया तथा स्वयं सालार मसूद सप्तऋषि ( सतरिख ) की ओर बढ़ा । मिरआते मसूदी के विवरण के अनुसार सतरिख ( बाराबंकी ) हिंदुओं का एक बहुत बड़ा तीर्थ स्थल था । एक किवदंती के अनुसार इस स्थान पर भगवान् राम व लक्ष्मण ने शिक्षा प्राप्त की थी । यह सात ऋषि का स्थान था , इसीलिए इस स्थान का नाम सप्तऋषि पड़ा था , जो धीरे - धीरे सतरिख हो गया । सालार मसूद विलग्राम , मल्लावा , हरदोई , संडीला मलिहाबाद , अमेठी व लखनऊ होते हुए सतरिख पहुँचा । उसने अपने गुरु सैयद इब्राहिम बारा हजारी को धुंधगढ़ भेजा , क्योंकि धुंधगढ़ के किले में उसके मित्र दोस्त मोहम्मद सरदार को राजा रायदीन दयाल व अजय पाल ने घेर रखा था । इब्राहिम बाराहजारी जिधर से गुजरते गैर - मुसलमानों का बचना मुश्किल था । बचता वही था , जो इसलाम स्वीकार कर लेता था । 

   आईन - ए - मरादी के अनुसार --

         निशान सतरिख से लहराता हुआ बाराहजारी का । 
           चला है धुंधगढ़ को काफिला बाराहजारी का । 
           मिला जो राह में मुनकिर उसे दोजख में पहुँचाया ।
           बचा वह जिसने कलमा पढ़ लिया बाराहजारी का ।

इस लड़ाई में राजा दीनदयाल व तेजसिंह बड़ी ही वीरता से लड़े , लेकिन वीरगति को प्राप्त हुए । परंतु दीनदयाल के भाई राय करनपाल के हाथों इब्राहिम बाराहजारी मारा गया । कड़े के राजा देव नारायन और मानिकपुर के राजा भोजपत्र ने एक नाई को सैयद सालार मसूद के पास भेजा कि वह विष से बुझी नहन्नी से उसके नाखून काटे , ताकि सैयद सालार मसूद की इहलीला समाप्त हो जाए , लेकिन इलाज से वह बच गया । इस सदमे से उसकी माँ खुलर मुअल्ला चल बसी । इस प्रयास के असफल होने के बाद बड़े मानिकपुर के राजाओं ने बहराइच के राजाओं को संदेश भेजा कि हम अपनी ओर से इसलामी सेना पर आक्रमण करें और तुम अपनी ओर से । इस प्रकार हम इसलामी सेना का सफाया कर देंगे । परंतु संदेशवाहक सैयद सालार के गुप्तचारों द्वारा बंदी बना लिये गए इन संदेशवाहकों में दो ब्राह्मण और एक नाई थे । ब्राह्मणों को तो छोड़ दिया गया , लेकिन नाई को फाँसी दे दी गई ।

गाजी का मानिकपुर पर धावा
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इस भेद के खुल जाने पर मसूद के पिता सालार साहू ने एक बड़ी सेना के साथ बड़े मानिकपुर पर धावा बोल दिया । दोनों राजा देवनारायण व भोजपात्र बड़ी वीरता से लड़े , लेकिन परास्त हुए । इन राजाओं को बंदी बनाकर सतरिख भेज दिया गया । वहाँ से सैयद सालार मसूद के आदेश पर इन राजाओं को सालार सैफुद्दीन के पास बहराइच भेज दिया गया । जब बहराइच के राजाओं को इस बात का पता चला तो उन लोगों ने सैफुद्दीन को घेर लिया । इस पर सालार मसूद उसकी सहायता हेतु बहराइच की ओर आगे बढ़े । इसी बीच उनके पिता सलार साहू का निधन हो गया । बहराइच के पासी राजा भगवान् सूर्य के उपासक थे । बहराइच में सूर्य कुंड पर स्थित भगवान् सूर्य की मूर्ति की वे पूजा करते थे । उस स्थान पर प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास के प्रथम रविवार जो वृहस्पतिवार के बाद पड़ता था , एक बड़ा मेला लगता था । यह मेला सूर्य ग्रहण , चंद्र ग्रहण तथा प्रत्येक रविवार को भी लगता था यह परंपरा काफी प्राचीन थी । बालार्क ऋषि के भगवान् सूर्य के प्रताप से इस कुंड में स्नान करनेवाले कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाया करते थे । 

बहराइच का युद्ध और उसकी वीरगाथाएं
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बहराइच को पहले ' ब्रह्माइच ' के नाम से जाना जाता था । सालार मसूद के बहराइच आने का समाचार पाते ही बहराइच के राजा गण - राजा रायब , राजा सायब , अर्जुन , भीखन , गंग , शंकर , करन , बीरबल , जयपाल , श्रीपाल , हरपाल , हरक्ष , जोधारी व नरसिंह महाराज सुहेल देव के नेतृत्व में लामबंद हो गए । ये राजा गण बहराइच शहर के उत्तर की ओर लगभग आठ मील की दूरी पर भकला नदी के किनारे अपनी सेना सहित उपस्थित हुए । अभी ये युद्ध की तैयारी कर ही रहे थे कि सालार मसूद ने उन पर रात्रि - आक्रमण ( शबखून ) कर दिया । मगरिब की नमाज के बाद अपनी विशाल सेना के साथ वह भकला नदी की ओर बढ़ा और उसने सोती हुई हिंदू सेना पर आक्रमण कर दिया । इस अप्रत्याशित आक्रमण में दोनों ओर के अनेक सैनिक मारे गए , लेकिन बहराइच की इस पहली लड़ाई में सालार मसूद विजयी रहा । पहली लड़ाई में परास्त होने के पश्चात् पुनः अगली लड़ाई हेतु हिंदू सेना संगठित होने लगी , लेकिन उन्होंने रात्रि - आक्रमण की संभावना पर ध्यान नहीं दिया । उन्होंने राजा सुहेल देव के परामर्श पर आक्रमण के मार्ग में हजारों विषबुझी कीलें अवश्य धरती में छिपाकर गाड़ दीं । ऐसा रातोरात किया गया । इसका परिणाम यह हुआ कि जब मसूद की घुड़सवार सेना ने पुनः रात्रि आक्रमण किया तो वे इनकी चपेट में आ गए । हालाँकि हिंदू सेना इस युद्ध में भी परास्त हो लेकिन इसलामी सेना के एक - तिहाई सैनिक इस युक्ति प्रधान युद्ध में मारे गए । भारतीय इतिहास में इस प्रकार युक्तिपूर्वक लड़ी गई यह एक अनूठी लड़ाई थी । दो बार धोखे का शिकार होने के बाद हिंदू सेना सचेत हो गई तथा महाराज सुहेल देव के नेतृत्व में निर्णायक लड़ाई हेतु तैयार हो गई । कहते हैं कि इस युद्ध में प्रत्येक हिंदू परिवार से युवा हिंदू इस लड़ाई में सम्मिलित हुए । महाराज सुहेल देव के शामिल होने से हिंदुओं का मनोबल बढ़ा हुआ था । लड़ाई का क्षेत्र चित्तौरा झील से हठीला और अनारकली झील तक फैला हुआ था । #10जून_1034 ई . में हुई इस लड़ाई में सालार मसूद ने दाहिने पार्श्व ( मैमना ) की कमान मीर नसरुल्लाह को तथा बाएँ पार्श्व ( मेसरा ) की कमान सालार रज्जब को सौंपा तथा स्वयं केंद्र ( कल्व ) की कमान संभाली तथा भारतीय सेना पर आक्रमण करने का आदेश दिया । इससे पहले इस्लामी सेना के सामने हजारों गायों व बैलों को छोड़ा गया , ताकि हिंदू सेना प्रभावी आक्रमण न कर सके , लेकिन महाराजा सुहेल देव की सेना पर इसका कोई भी प्रभाव न पड़ा । वे भूखे सिंहों की भाँति इस्लामी सेना पर टूट पड़े । मीर नसरुल्लाह बहराइच के उत्तर में बारह मील की दूरी पर स्थित ग्राम दिकोली के पास मारे गए । सैयद सालार मसूद के भानजे सालार मियाँ रज्जब बहराइच के पूर्व तीन किमी . की दूरी पर स्थित ग्राम शाहपुर जोत यूसुफ के पास मार दिए गए । इनकी मृत्यु 8 जून , 1034 ई . को हुई । अब भारतीय सेना ने राजा करन के नेतृत्व में इस्लामी सेना के केंद्र पर आक्रमण किया , जिसका नेतृत्व सालार मसूद स्वयं कर रहा था । उसने सालार मसूद को घेर लिया । इस पर सालार सैफुद्दीन अपनी सेना के साथ उनकी सहायता को आगे बढ़े । भयंकर युद्ध हुआ , जिसमें हजारों लोग मारे गए । स्वयं सालार सैफुद्दीन भी मारा गया 

सैयद सालार मसूद गाजी कि समाधि
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शाम हो जाने के कारण युद्ध बंद हो गया और सेनाएँ अपने शिविरों में लौट गई । 10 जून , 1034 को महाराजा सुहेल देव के नेतृत्व में हिंदू सेना ने सालार मसूद गाजी की फौज पर तूफानी गति से आक्रमण किया । सैयद गाजी  बड़ी वीरता के साथ लड़ा , लेकिन अधिक देर तक ठहर न सका । पासी राजा सुहेल देव ने शीघ्र ही उसे अपने बाण का निशाना बना लिया और उनके धनुष द्वारा छोड़ा गया एक विष बुझा बाण सालार मसूद के गले में आ लगा , जिससे उसका प्राणांत हो गया । इसके दूसरे ही दिन शिविर की देखभाल करनेवाला सालार इब्राहिम भी बचे हुए सैनिकों के साथ मारा गया । सैयद सालार मसूद गाजी को उसकी डेढ़ लाख इस्लामी सेना के साथ समाप्त करने के बाद महाराजा सुहेल देव ने विजय पर्व मनाया और इस महान् विजय के उपलक्ष्य में कई पोखरे भी खुदवाए । वे एक विशाल ' विजय स्तंभ ' का भी निर्माण कराना चाहते थे , लेकिन वे इसे पूरा न कर सके । संभवत : यह वही स्थान है , जिसे एक टीले के रूप में श्रावस्ती से कुछ दूरी पर इकोना - बलरामपुर राजमार्ग पर देखा जा सकता है ।

(किताब का संदर्भ बस यहीं तक )

नोट - महाराजा सुहेलदेव को  अवध गजेटियर के अनुसार पासी जाति का स्वीकार किया गया राजभर व जैन पर एकमत नहीं है यह किताब इस बात की पुष्टि करती है 

महाराजा सुहेलदेव पासी के बारे में लिखने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद डॉ परशुराम गुप्त जी का स्वागत एवं अभिनन्दन सारी बाते इस किताब से संदर्भित है । ये बात हो गई इस किताब और लेखक की आगे बढ़ते है ।

#10_जून_1034_विजय_दिवस
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पासी राजा सुहेल देव और राजपासी राजा कंस  1030 ई.-1034 ई.
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जैसा कि ऊपर आपने राजा सुहेल देव पासी के बारे में पढ़ा 
और जाना  बहुत सी चीजे है जो अभी बाकी सी है जैसे
लखनऊ का संघर्ष , रजपासी राजा कंस । जो उस समय थे और जिनको कोई नहीं जानता है । क्योंकि सैयद सलार मसूद गाजी कि आधी सेना लखनऊ में ही ख़तम हुई थी । और लखनऊ के पासियो  के संघर्ष  में कोई नहीं जानता है इसलिए उन वीर रणबांकुरो को भी  जानना जरूरी है ।

राजपासी  राजा कंस 
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राजा                   -       राजपासी राजा कंस       
समयकाल            -    ( 980 - 1031)  ई.
राजगद्दी               - कंसमण्डी  ( लखनऊ )
क्षेत्र                     -   अवध ( उत्तरप्रदेश )
प्रथम युद्ध            - उन्नाव- संडीला सीमा क्षेत्र
दृतिया बर्बर युद्ध    - कंसमण्डी की लड़ाई
तृतीया युद्ध         -  ( कैथोलि-खातौली ) निकट कंसमण्डी
वीरगति              -  1031 ई.  ( कैथोलि - खतौली )
     
राज्य-सीमायें       -   उन्नाव , मलिहाबाद , संडीला ककोरी, हरदोई ,सीतापुर , पश्चिमी लखनऊ आदि ।

11 सदी के शुरुआती समय में महाप्रतापी राजा कंस जो जाति के राजपासी थे जिनको राज्य अपने पुरखो से  मिली थी उनका शासन लखनऊ के  काकोरी (मलिहाबाद ) के निकट कंवलाहार कंसमण्डी ( कंसमण्डप) में था
राजपासी राजा कंस  का समयकाल 980 ईस्वी से 1031 इस्वी तक माना गया है
जब भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों के खतरे मंडरा रहे थे और जब सैयद सालार मसूद गाजी का जेहाद ( धर्मयुद्ध ) छेड़ा था और पूरे भारत को फतेह करना चाहता था
उसकी लालसा पूरे भारत को जीतकर इस्लाम फैलाना था जब पंजाब को जीतते हुवे दिल्ली जीतकर कन्नौज पर हमला किया कन्नौज का राजपूत राजा बचने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया ,जेहादियो की सेना में भी शामिल हो गया ,आगे उसे रोकने टोकने वाला कोई ना मिला लेकिन जब गंगा पार कर अवध में दाखिल हुआ तो उसकी बर्बरता चरम पे थी जिधर से  भी गुजरता  हिदुओ का बचना मुश्किल था जब तक कि वह इस्लाम कबूल ना कर ले ,उसके आतंक के चर्चे हर जगह फैल गए  लोगों में त्राहि त्राहि मच गई जहाँ सैयद मसूद गाजी की सवालाख  जेहादियों सेना थी ।

लखनऊ के पासियो का बिकट संघर्ष
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वही अवध में रजपासियो  छोटे छोटे राजाओ के छोटे गडराज्य थे जो आपस मे मिलकर रहते थे और पश्चिम अवध  में राजपसियो का  शासन था जो अपने स्वतंत्र प्रवर्ति के लिए जाने जाते थे जो बेहद स्वाभिमानी ,और अड़ियल रुख वाले होते  थे जो बात बात पर म्यान से तलवार निकाल लिया करते थे
उन वीर रजपासियो  का शासन पूरे  पश्चिम अवध में उस समय था
सैयद सालार मसूद गाजी की जो विजय अभी तक हुवी थी उनमे से लखनऊ की  लड़ाई उसने कभी ख्वाब में भी नही सोचा था ,ना ही उम्मीद की थी
मसूद गाजी के लखनऊ में कदम रखते ही पहली लड़ाई कंसमण्डी के राजपासी राजा कंस से लड़नी पड़ी इस जबदरस्त मुकाबले में उसके दो सेनापति सैयद हातिम और  ख़ातिम  मारे गए
 मसूद गाजी जो सवा लाख से भी ज्यादा थे और राजपासी कुछ चंद हज़ार फिर भी अपने ताकत का लोहा मनवा लिया
राजा कंस से पहली लड़ाई उन्नाव और संडीला के किलो पर हुवी फिर उसके बाद जबरदस्त लड़ाई काकोरी मलिहाबाद पे हुवी इस भयानक युद्ध मे राजपासी राजा कंस के  हाथों से ककोरी निकल गया वँहा मुस्लिमों का कब्जा हो गया ।
सैयद गाजी ने  वँहा अपनी सैनिक अड्डा  बना लिया

सैयद  हातिम  और  खातिम 
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उसके बाद उसके दो सेनापति  सैयद  हातिम  और खातिम  ने राजा कंस की गद्दी ( सिंहासन ) कंसमण्डी पर हमला हुआ ये जबरदस्त लड़ाई हुवी यहाँ , तुर्को की हार निश्चित हो गयी लेकिन तब तक गाजी की हज़ारो घुड़सवार वँहा आ डटे
दुबारा मदद मिलने से गाजी का पलड़ा भारी पड़ने लगा ,लड़ाई लड़ते लड़ते रात हो गयी गाजी की सेना भारी पड़ने लगि तब जाकर राजा कंस ने सारी सेना किले के  अंदर बुला  ली और गुप्त सुरंगों से अपनी बाहरी मदद का इंतजार करने लगे क्योंकि पड़ोसी राजा भी उस समय मुश्किल में थे क्योंकि गाजी ने सारे आसपास के राजाओ पर एक  साथ हमला किया ताकि कोई राजा एक दूसरे की मद्दद ना कर सके इसमे कोई दो राय नही है कि गाजी एक कुशल युद्व नीति का धनी था ।
जब गाजी की सेना कंसमण्डी के किले को चारो तरफ  घेर ली और गोल गोल चक्कर काटने लगी थी उन लोगो ने किले के दरवाजे को तोड़ने और किलो पे चढ़ने की बहुत कोशिश की लेकिन किले पे मजबूत धनुषधारी राजपासी ने अपना कमाल दिखया उस समय राजपासियो के बनाये तीर पूरे भारत मे जाती थी और राजपासियो कि तीरंदाजी दुनिया मे मशहूर थी
वह युद्ध बड़ा भयानक था
वह रात में लड़ा गया युद्ध था  उसी युद्ध मे राजपासी राजा कंस ने तेल को गरम करवा कर बड़ी तरकीब से सैयद हातिम ख़ातिम पर डलवा दिया ,जिससे दोनो वंही तड़प तड़प के मर गया

सैयद हातिम और ख़ातिम के मरते ही मुसलमानो में भगदड़  मच गई और भाग खड़े हुवे वहाँ राजपासी राजा कंस की रात में जीत दर्ज हुवी
यह युद्ध कोई एक दो दिन का नही था फिर आगे चलकर राजा कंस का और युद्ध हुवे जहाँ कंसमण्डी से कुछ दूरी पर खातौली  ( कैथोलि) पर राजपासी राजा कंस वीरगति हुवे
ये युद्ध बड़ा ही भयानक और राजपसियो क बलिदान की गँवाह है जिहोने इस देश धर्म माटी के खातिर अपने प्राणो की आहूति दे दी जिनका नाम लेने वाला आज कोई नही है उन वीर राजपासियो के बलिदान के बारे में एक छोटी सी पेशकश आपतक लाया हूँ
और उस युद्ध मे मारे गए जेहादी आज भी मलिहाबाद में गंजशहीदा  में आज भी दफन है
और इस युद्ध के बाद जब गाजी आगे बढ़ा तो 2 साल बाद  राजा सुहेल देव पासी ने सैयद सालार गाजी को मार गिराया और उसके जेहाद पर लगाम लगा दी

ये है कहानी राजपासी राजा कंस की है जिन्होंने गाजी के  मारे जाने  से  2,3 साल पहले लखनऊ के संघर्ष की कहानी को बंया करती है  राजा सुहेल देव से पहले राजा कंस ने जो भयानक युद्ध किया था उससे उबरने में गाजी को सालो लग गए और अगली लड़ाई में गाजी बहराइच में मारा जाता है पासी राजा सुहेल देव के द्वारा 

 राजपासी कंस का संदर्भ -

 1. Lucknow monument 1989, p.37
2. ताजदारे ए अवध प.7.etc

राजपूतों और राजभर के फर्जी दावे 
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कुछ दिनों से देखा जा रहा है कि पासी राजा सुहेलदेव को राजभर एवं राजपूत बनाने की कोशिश की जा रही है 
आज से नहीं बहुत पहले से हो रहा है जिसकी शुरूवात कई दशक से ही हो रहा था  (1900-1950 ) ई. इस समय आर्य समाजियों ने कई सारी  जातियों को ब्राह्मण और क्षत्रियों की गोत्रों से जोड़कर उनका इतिहास लिखा ताकि उनका ब्राह्मणीकरण हो सके , वह अपने को ब्राह्मण समझ कर खुश रहे ताकि वास्तविक इतिहास का दर्पण ना कर सके , और ब्राह्मणों क्षत्रियों के मानसिक गुलाम बने रहे  , 1920 के दशक में पासी जाति की ब्राह्मण बताया जाने लगा , सिर्फ पासी है नहीं कई जातियां , जैसे , भंगी , चमार , अहीर , पासी और यहां तक भर जाति को भारद्वाज से जोड़कर उनको ऋषियों की संतान बताया गया बल्कि गोरखपुर के भर राजा भारद्वाज था 
और इस कार्य को अंजाम देने के लिए इन लोगों ने गजेटियर  और वेदों का सहारा लिया ताकि हर जाति को ब्राह्मण एंव  क्षत्रिय  बताया जा सके और उनका ब्रहमनिकरण किया जा सके और वह वास्तविक इतिहास से वंचित रहे और असली राजपूत एवं क्षत्रिय अपना वर्चस्व स्थापित किए रहे और और इसीलिए उन्होंने 1940 के दशक जैन राजा कहकर प्रचारित    किया और आगे चलकर 500 बीघा जमीन जो  (एक नाटक का हिस्सा रहा  )  राजपूतों द्वारा दी गई थी इसलिए दिया गया था कि आज अपना  साक्ष्य दिखा सकें भविष्य में आज वही कर रहे है  ।

और यह हर जगह या कहकर प्रचारित करवा रहे हैं  1960- 1970 दशक में मात्र  पासी जाति का वोट बैंक पाने के लिए राजा सुहेलदेव पासी बताया गया-
                           तो  मै आपको बता दूं ऐसा प्रचार करना हास्य पद है और षड्यंत्र की निशानी है अगर ऐसा होता  तो भला 1948 की पुस्तिका " पासी वीर महासभा" में राजा सुहेल देव पासी का जिक्र क्यों होता है  1970 से 40 साल पहले लिखी थी ।  
और 1940 के दशक लोग में बनी "पासी वीर दल"
अपनी कविताओं में राजा सुहेल देव पासी को क्यों गाता!! अगर यदि यह अस्मिता बाद में  बनी होती तो ,1970 के 40 साल पहले  पासियो में यह तथ्य विद्यमान क्यों होता ।

चलो अच्छा हुआ यह  पासी वीर महासभा की पुस्तिका अभी पड़ताल  में कुछ पुराने लोगों के यहां मिली  नहीं तो, ये लोग यह कहते 1970 की नहीं - नहीं 1940 में पासी का वोट बैक पाने के लिए उनको सुहेल देव पासी किय गया  था 😆😄😂 जबकि उस समय देश भी आज़ाद नहीं हुआ था  मतलब कुछ भी कर सकते है यह लोग 😆😁

तो षड्यंत्र कारी अपने दिमाग पर जोर डालिए  🤔🤔🤭 

" सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं"

इसका मतलब साफ है कि राजा सुहेलदेव पासी को पासी समाज सदियों सदियों से अपना मानता है और अपनी जाति का बताता आया है और सेंसस ऑफ़ इंडिया और भारतीय विद्वानों के मतानुसार राजा सुहेलदेव पासी थे आज इसे षड्यंत्रकारी राजभर और राजपूत बताकर राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं राजभर अक्सर भर का साक्ष्य दिखाता है  और राजभर साबित करने की कोशिश करता है जबकि भर पासी की अवध में 14 उपजाति में से एक है ।
                 और राजपूत जो दावा करता  उसका  भी करना निराधार है क्यूंकि उनको बैंस बताता है जबकि आपको पता होना चाहिए अवध के बैंस राजपूत की उत्पति भर और पासी से बताई जाती है कई राजपूतों के प्राचीन घराने पासी और भर के बताए जाते है दूसरी बात वह उनके जैन बता कर राजपूत बनाने की कोशिश कर रहे है वह भी गलत है जैन कोई जाति नहीं धर्म के नाम से जाना जाता है जिसकी वास्तविकता यह है कि कुछ  इतिहासकारों के मतानुसार राजा सुहेलदेव में जैन धर्म ग्रहण कर लिया था तो इससे उनकी जाति नहीं बदलती है उनका धर्म जरूर  बदल सकता है । तो साक्ष्यों के आधार पर और आज़ाद भारत के विद्वानों के मतानुसार राजा सुहेल देव पासी थे  

( The Pasi Landlords )

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गुरुवार, 30 जुलाई 2020

#पासी_जाति

1852 , लंदन में छपा Article पासी जाति के बारे में क्या कहती है जानिए पासी महाबलियों के बारे में 
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"The following notice of them is copied from an article on Oude, published in an Indian periodical in 1852"

 “ The Pasees live chiefly in the Banghor district in the northern part of this Kingdom. They are generally short, square shouldered, and well built. They are brave, active, and strong, and characterised - paradoxical as it may appear-as much by their honesty as for their extreme cunning and deceitfulness. They seldom till the soil: agri- culture is not their forte. They are professional thieves, and steal every thing they can lay a hand on, from a horse down to a pair of old shoes. In fighting, they make use of bows and arrows, and through their practice and strength, with unerring aim. Their bow has general- ly a double curve, and is made of horn. When using it, they support it on the ground and bend it with their toe and right hand. But

" their mode of warfare is chiefly a guerilla system" 

अंग्रेजो द्वारा प्रकाशित ( Indian periodical in 1852 ) नीचे इसका पन्ना संलग्न किया गया है -

1852 मैं छपा एक आर्टिकल था जो लंदन में पब्लिश हुआ था इसमें पासी जाति के बारे में उनकी कार्यशैली उनकी जीवन शैली के बारे में दर्शाया है यह आर्टिकल बताता है कि अवध में अट्ठा 1852  के समय काल में पासी अपने अपने क्षेत्र में बड़े शक्तिशाली थे यह हर क्षेत्रों में कार्यरत है इनका मुख्य ता पेशा सैनिक पेशा और चौकीदारी पेेेशा  था  

==दस्तावेजों के अनुवाद==

>>>> पासी मुख्यत: मध्यम कद के , चौकोर कंधे वाले, अच्छे तरह से निर्मित , अच्छी शारीरिक क्षमता वाले होते है।

>>>> इनके धनुष दोहरे घुमावदार ( double curve) वाले होते हैं जिनके निचले सिरे  सींग से  बने होते है जो बेहद घातक होते है 

>>>> #पासी छापामार युद्ध पद्धति में विश्वास रखते हैं ,  (छापामार युद्ध करने में  माहिर होते हैं) guerilla system 

>>>> अधिकतर #पासी_धनुष -बाणो से लैस होते थे ।

>>>> विभिन्न तालुकदारों के यहां सेना में शामिल थे

>>>> #पासी_जाति_कृषि में निपुण नहीं थे ( क्योंकि  इनका परंपरागत पेशा मात्र युद्ध करना और स्वतंत्र राज करना था )

>>>> पासी जाति के लोग #बहादुर साहसी निडर वफादार इमानदार थे ,वादे के पक्के  थे यह उनके लिए वफादार नहीं थे जो चालाकी करते थे ।

>>>> उस समय दो #खतरनाक पासी सरदार (  chief प्रमुख )  बड़े बड़े #तालुकदारो के यहां अपनी फौजों के साथ सेवा सशस्त्र अनुचर करते है।  

>>>> #अंग्रेज सेनापति एल्डरटोन भेटाई की लड़ाई (1850) में #पासियों के हाथों मारा गया था पासी मजबूती से किले की सुरक्षा कर रहे थे 
 #युद्ध_पासी #राजा_गंगा_बख्श रावत और अंग्रेजो के विरुद्ध हुआ था, जो  (बाराबंकी-देवा के पास कासिम गंज ,भेटाई) में पड़ता है 

( दोस्तों पर मैंने अनुवाद किया है यह एक आर्टिकल और गजट ईयर के अध्ययन के तहत अपनी बात रख रहा हूं ) 
ref.....Oude , it's Past and  its Future ,1859 page.no. 442.
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2.  पासी जाति के लोगों की असली फोटो ,1868 
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#पासी_जाति का #इतिहास | People of India ,1868 ,Passes caste, (oude)
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दुश्मन #अंग्रेजों द्वारा पासियों को नवाजे गए 
शब्द-आभूषण!!! 
(अंग्रेजों द्वारा प्रकाशित The People of India, Vol-II, 1868) 

>>> अच्छी शारीरिक बनावट और मजबूत कंधे वाले 

>>> बहादुर  

>>> फुर्तीले और 

>>> #शक्तिशाली

>>> उच्च कोटि के ईमानदार साथ ही साथ चतुर और धोखेबाज (क्योंकि पासी, अंग्रेजों के साथ कभी भी वफादारी नहीं करते थे मौका पाते ही उनको मार देते थे aur लूट लेते थे) 

>>> कभी-कभी खेती करने वाले । खेती  करना पासियों पेशा नही था। 

>>> युद्ध में तीर धनुष का प्रयोग करने वाले तथा अचूक निशानेबाज

>>> सत्यनिष्ठ कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार

>>> हथियारबंद और अनुशासित पासी,  सेनापतियो के रूप में तालुकदार और राजाओं की पहली पसंद । 

>>> राजमार्गों के लुटेरे , डकैत  राजमार्गों के लिए खतरनाक और नुकसान पहुंचाने वाले (ऐसा इसलिए कहा क्योंकि जब पासी तीर धनुष तलवार से मुकाबला करने में अक्षम हो गए तो इन अंग्रेजी सेना के काफिलो   पर गुरिल्ला आक्रमण करके लूटने का काम करते थे जिससे कि पासियों के पास गोला बम बारूद तथा उन्नत किस्म के हथियार आ जाते थे और बाद में उन्हीं हथियारों के साथ में अंग्रेजों के साथ मुकाबला करके उन्हें हराते थे उनको खत्म कर देते थे। ) 

Low cast  कहने का तात्पर्य --  अंग्रेजों द्वारा बनाए गए लोग कास्ट सारणी में 62 जातियां हैं जिसमें ओबीसी की समस्त जातियों का समावेश है इसमें कुर्मी यादव मौर्या इत्यादि सभी को मिलाकर हैं। 

बाकी आप खुद पढ़ सकते हैं इस पेज में। 

>>> फोटो में तलवार धारी  और लठैत पासियों का आप देख सकते हैं।

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#पासी जाति के बारे में ज्यादा से ज्यादा जाने के लिए हमारी यूट्यूब चैनल पर जाए और पुराने वीडियोस को देखिए और लेख कों पढ़िए 
 धन्यवाद।
#pasi_cast #pasi_itihas
( कुंवर प्रताप रावत )
The Pasi Landlord

बुधवार, 29 जुलाई 2020

क्रांतिकारी मदारी पासी

Eka movement और मदारी पासी : हरदोई का किसान विद्रोह
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परिचय :
              नाम = क्रांतिकारी मदारी पासी
            निवास = अहिरोरी क्षेत्र , हरदोई
        आंदोलन = एका आंदोलन ( 1920-1921)
          प्रांत = अवध (यूनाइटेड प्रोविंस ) , हरदोई , संडीला , बाराबंकी , सीतापुर, खीरी, रायबरेली, आदि।

संघर्ष :
              ब्रिटिश साम्राज्यवाद एवं अत्याचारी जमींदार और तालुकेदारों के खिलाफ , मजदूरों -किसानों के अधिकारों की लड़ाई , लड़ाई बराबरी की, अपने हक़ कि

निष्कर्ष : मदारी पासी के नेतृत्व में एका आंदोलन अन्य आंदोलन के मुकाबले हवा की गति से फैला फलस्वरूप जालिम तालुकेदार और जमींदार अपने घुटने के बल आ गए, वहीं तालुकेदारों और जमींदार मदारी पासी के शर्तों को मानने पर विवश हुए, दूसरे आंदोलन कर रहे लोग आकर्षित होकर एका में कूद पड़े , इस कारण वश यह आंदोलन विकराल रूप धारण कर पूरे उत्तर प्रदेश (united province's) में फ़ैल गया , इस आंदोलन से तंग आकर तालुकेदारों के साथ मिल ब्रिटिश सरकार ने पूरी ताकत से यह आंदोलन 1922 के अंत तक दबा दिया गया ,मदारी पासी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका
उनकी मर्जी के बिना कोई उन तक पहुंच नहीं सकता था जबतक की वह खुद नहीं चाहते थे वह आजीवन स्वतंत्र रहे और भूमिगत हो गए ।

नोट 👉 - प्राप्त जानकारी 1922 के दौरान लिखे गए कुछ खास दस्तावेजों से ,1920 के दशक में छपे अखबारों के खबरों से उनके हरफनमौला गतिविधियों की जानकारी होती है

नोट 👉 - अभी तक प्राप्त जानकारी को और ज्ञानवर्धक बनाने एवं मदारी पासी जी को और भी ज्यादा जानने , समझने हेतु उनके पीछे के कड़ियों को जुटाने की कोशिश की गई है, कि कौन थे ? कहां के थे ? टूटी फूटी कड़ियों को जोड़ते हुए आज उनके बारे में रोचक तथ्यों से आप सभी को अवगत कराना है ।

     
               ।। अहिरोरी की घटना ।।


" Gazetteer of the Province of Oudh, Volume 2 , page ,244,245

1841 colonel low एक स्पेशल ऑडर पास करते है अहिरोरी के बागियों को गिरफ्तार करने के लिए यह इलाका पासियो से भरा हुआ है जिनको अंग्रेजो ने डकैत कहा ,....कैप्टन होलिंग 3 company infantry लेकर
विद्रोहियों का दमन करने आधी रात वहां पहुंच जाता है वहां संघर्ष शुरू होता है पर गोलियों के आवाज़ सुनकर , " गोहर " पाते ही पासी इक्कठा होकर बिखरे हुए अंग्रेज सिपाहियो को मार दिया........। "

ऊपर मैंने एक अहिरोरी की घटना 1841 का उदाहरण मात्र इसलिए दिया है ताकि आप समझ सके अहिरोरी अंग्रेजो के नज़र में विद्रोहियों का गढ़ था और वह इलाका पासियों से भरा हुआ था , और खास बात यह है कि मदारी पासी अहिरोरी क्षेत्र के ही थे यानी बागी पासियों के क्षेत्र से ..... बागीपना उनके खून में ही था ।
उन दिनों यह एक कारण मुख्य था किसी भी इंसान को बागी बनाना .......।
   
                    " मानो कि मदारी पासी का वायक्तिव कह रहा हो कि हमने हथियार छोड़े हैं चलाना नहीं भूले , और घड़ी आने पर हथियार उठा सकते हो "

मदारी पासी 1920 के समय लोगो के अनुभव अनुसार 70 साल हो चले थे यानी अपने वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे थे और उन बूढ़ी हड्डियों ने वह करके दिखा दिया जो कोई आम जन नहीं कर सका और साबित कर दिया कि " क्रांति की कोई उम्र नहीं होती " यह हिम्मत जरूर उनके पुरखों से उनको मिली थी ,जिनका दमन होते उन्होने बाल्यकाल में देखा होगा

              एका आंदोलन /eka movement

एका आंदोलन मदारी पासी के नेतृव में शुरू किया गया। यह आंदोलन इतना मजबूत और संगठित था कि इसमें हर एक जाति एवं धर्म के लोग शामिल हुए थे तालुकेदारों और जमींदारो के अत्याचार के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंक दिया

अवध किसान आंदोलन के नायकों में मदारी पासी का नाम बड़ी जबर तरीके से लिया जाता और याद किया जाता है वह गरीबों के मसीहा कहे जाते थे और सभी समाज नायक हैं। गरीब किसानों की बेदखली, लगान और अनेक गैर कानूनी करों से मुक्ति के लिए उन्होंने संगठित और विद्रोही आंदोलन चलाया था। जब दक्षिणी अवध प्रांत का उग्र किसान आंदोलन सरकार और जमींदारों के क्रूर दमन के कारण 1921 के मध्य में दबा दिया गया था तथा असहयोग आंदोलनकारियों द्वारा निगल लिया गया था, ठीक उसी समय, मदारी पासी का ‘एका आंदोलन’ हरदोई जिले के उत्तरी और अवध के पश्चिमी जिलों में 1921 के अंत में और 1922 के प्रारम्भ में प्रकाश में आया।

मदारी पासी की कोई भी तस्वीर उपलब्ध नहीं है। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के मोहनखेड़ा में उनकी स्मृति में चबूतरा का निर्माण किया गया है और ये एक छोटी सी कोशिश स्थानीय लोगो के अनुसार बताए गए हुलिए के आधार पर एक चित्र से बनाया गया है ( नीचे देखें )

        1922 के अखबारों के अनुसार जो बाते पता चलती है वह बेहद गदगद और जिज्ञासा पैदा करती है कि कितना आक्रामक रहा था एका आंदोलन और मदारी पासी का इतिहास

ब्रिटिश अखबार ‘द ग्लासगो हेराल्ड’, मार्च 10, 1922 और ‘द डेली मेल’, मार्च 10, 1922 ने यह समाचार छापा-

‘‘एका’’ का विकास हरदोई का एका आंदोलन निःसंदेह खतरनाक है लेकिन एक पल के लिए यह उतना चिंताजनक नहीं माना जा सकता । इसके अपील की नवीनता, अशिक्षित जनता की कल्पना है । मदारी पासी उसके नेताओं में से एक है जो चार आना प्रति की दर से टिकट बेच रहा है। माना यह जा रहा है कि यह धारक (टिकट धारक) को स्वराज मिलने पर भूमि का अधिकार प्रदान करेगा। इस आंदोलन को करने के लिए कुछ ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक स्वरूप प्रदान किया गया है और व्यवहार में गंगा जल लेकर एकता कायम रखने का संकल्प लिया गया है। कई उदाहरण देखे गए हैं जब लोगों ने एका के शपथ को लेने से इन्कार किया लेकिन उन्हें शपथ लेने के लिए मजबूर किया गया । कुछ गांवों में एका वालों ने पंचायतों का गठन कर लिया है और एक गांव में, जहां राजनैतिक वातावरण एक हद तक उत्तेजित है, उन्होंने अपना कमिशनर, डिप्टी कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक और शहर कोतवाल का गठन कर लिया है। असहयोग आंदोलनकारियों के भी कुछ हद तक इस नये आंदोलन के विकास पर चिंतित होने की सूचना है जो उनके नियंत्रण से बाहर हो रहा है । जमींदार आशंकित हैं कि नये ‘एका वालो’ं का उद्देश्य उन्हें उनकी रियासत से बेदखल करना है। वे सोच रहे हैं कि यह आंदोलन निश्चय ही क्रांति और अराजकता की ओर बढ़ रहा है। विश्वास किया जा रहा है कि जिले में जो एक हजार से ज्यादा गैर लाइसेंसी हथियार हैं "

   ANTI-LANDLORD MOVMENT IN INDIA

     TIMES " TELIGRAM , PER THE PRESS ASSOCIATION

" Lucknow Thursday : , Aika या एका आंदोलन के रूप में जाने जाना वाला, एक अधिक चिंता का कारण एवं चिंताजनक विषय है, जो कि संयुक्त राज्य के कुछ हिस्सों में तेजी से फैलता जा रहा है, यह एक कृषि आंदोलन है। इनके द्वारा विरोध जमींदार की अचूकता के खिलाफ है ..............नए आंदोलन का प्रमुख नेता एक मदारी पासी हैं , जो छोटी जाति के व्यक्ति हैं , जो पहले गाँव का चौकीदार था , जो अब खुद को राजा कह रहा है , जो कि 2000 और उससे जायदा की भीड़ के नेता के रूप में जिनके पास लठियाँ भाले और तीर - कमान हैं , गांवों को आतंकित करने जा रहा है । वहाँ भीड़ ने सभी पुरुषों को निष्ठा की शपथ पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला है और अपनी फसलों और इमारतों को नष्ट कर आंदोलन में शामिल होने के लिए मजबूर किया । अभी तक किसी भी रक्तपात की सूचना नहीं है , लेकिन मदारी और उनके सहयोगियों निर्विवाद रूप से एक विस्तृत क्षेत्र के स्वामी प्रतीत हो रहे हैं , जिनमें से मुख्य केंद्र पूरे यूनाइटेड प्रोविन्स में हरदोई , संडीला और बाराबंकी है । वहाँ की स्थिति अब अराजक है । मदारी को गिरफ्तार करने का एक प्रयास विफल रहा है , यह स्पष्ट है कि अन्य नेताओं से निपटा आंदोलन को दबा दिया जाना चाहिए , क्योंकि पहले से ही पड़ोस के प्रांतों में इसी तरह के आंदोलन की अफवाहें हैं । "

ऊपर की ये लाइने जो ,ब्रिटिश अखबार ‘द ग्लासगो हेराल्ड’, मार्च 10, 1922 और ‘द डेली मेल’, मार्च 10, 1922 ने यह समाचार छापा था - उसके अनुवाद का छोटा सा अंश दिया है जिससे कि हमें मदारी पासी के कार्यशैली और कुशलता कि भांप सकते है

यह आंदोलन गरीब किसानों की बेदखली, लगान और अनेक गैर कानूनी करों से मुक्ति दिलाने के लिए,और जालिम तालुकेदारो, जमीदारो के खिलाफ उनके मनमाने बर्ताव और अत्याचारी कानून के खिलाफ था हालांकि यह आंदोलन जिस तीव्र गति से फैला था उसी तीव्र गति से अंग्रेजों ने इसका दमन किया , क्योंकि अगर अंग्रेज इसका दमन ना करते हैं तो अंग्रेजी सत्ता बहुत पहले ही उखड़ गई होती क्योंकि उस समय प्रथम विश्व युद्ध के चलते ब्रिटिश सरकार पर खासा दबाव था वह आंतरिक चल रहे किसी भी विद्रोह जोखिम नहीं मोड़ लेना लेना चाहते थे ,
            इसलिए ब्रिटिश सरकार ने फौज लगाकर इस आंदोलन को बड़ी मजबूती से दबाया ,और ऊपर से उस समय चल रहा गांधी जी का असहयोग आंदोलन एका आंदोलन के आगे फीका पड़ रहा था , तीव्र गति से फैलने वाला " एका" आंदोलन असहयोग आंदोलन से कहीं आगे निकल गया था , तो ऐसा क्या हुआ एका आंदोलन कठोरता से दबाया गया, बल्कि असहयोग आंदोलन समानांतर मंद गति में चलता रहा । एक तरह से कह सकते हैं कि असहयोग आंदोलन " एका आंदोलन " को निकल गया ।

     " मुझे तो साजिश की बू आ रही है "

मदारी पासी का यह क्रांतिकारी आंदोलन मुर्दों में भी जान फूंक देता है एका आंदोलन ना फिर कभी देखा गया और ना ही कभी हुआ ।

         क्रांतिकारी मदारी पासी की को देखते हुए लगता है
क्रांति की कोई उम्र नहीं होती , और जहां अत्याचार है वहां दो चीजें होती हैं या डर मारे घुट-घुट के जीते रहो , या विद्रोह कर क्रांति पैदा कर दो , और क्रांति जब तक सफल नहीं हो सकती ,जब तक कि वह क्रांति जनता के बीच ना जाए और एका आंदोलन जानता कि क्रांति थी

                   - revolutionary -

मदारी पासी वास्तव में एक क्रांतिकारी थे और है और हमारे दिलो में रहेगें ।

( क्रांतिकारी मदारी पासी 1920-1921 )
  जय क्रांतिकारी - जय मदारी

बड़ी मेहनत के साथ खोजबीन करके यह सारा इतिहास आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं कृपया ज्यादा से ज्यादा इसे शेयर करिए और अपने भाइयों तक ईसको पहुंचाए

( कुंवर प्रताप रावत )
The Pasi Landlords

प्राप्त जानकारी
              1. 1922 की बेहद पुरानी किताब revolution or evolution
             2. इंटरनेट पर उपलब्ध ब्रिटिश अखबार ‘द ग्लासगो हेराल्ड’, मार्च 10, 1922 और ‘द डेली मेल’, मार्च 10, 1922 , की कटिंग फोटो
            3. स्थानीय किदवंती और कहानी में जीवित मदारी पासी का चित्रण ।

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मंगलवार, 28 जुलाई 2020

महात्मा श्री गुरु चरण देव


परशुराम सातन की औलाद हो तुम,सुदेलदेव बिजली के खानदान हो तुम, निकलते थे रण मे लरजति जमी थी, नही आप मे वीरता की कमी थी, गये भूल क्या हो ओ बातें पुरानी, तुम्ही ने तो थी जंग गांजर की ठानी, उठो सोने वालो क्या सोते रहोगे, ओहो लाज अपनी क्या खोते रहोगे, गैरो ने आकर शसन जमाया, मिला कर के लोगो को तुमको मिटाया ||

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महात्मा श्री गुरुचरण देव जी महाराज (1913 -1983) ई.
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नाम - श्री गुरुचरण देव जी
जन्म - 1913 - 1983 ई.
पिता - डालचंद पासी
गुरु - गोविंद जी महराज

माता का बचपन में स्वर्गवास हो गया बालक अवस्था में गुरु चरण देव शुरुआती शिक्षा प्राप्त कर कक्षा 8 (उस समय मिडिल कहते थे , पास थे) । प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर श्री गुरु चरण देव बाल ब्रह्मचारी संत हो गया उन्होंने भारत देश का खूब भ्रमण किया ,पासी कुल सपूत शिरोमणि गुरु चरण देव जी के हृदय में पासी जाति के लिए प्रेम अंकुरित हुआ । वेद पुराण और ऐतिहासिक ग्रंथों का अध्ययन कर ज्ञान अर्जित किया साधुवेश धारी होकर पासी जाति की गिरी हुई अवस्था को देखा प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों को सूक्ष्मता से अध्ययन किया । उनके अथक परिश्रम से पासी जाति का इतिहास खोज निकाला एवं पासी इतिहास को सुदृढ़ किया एवं पासी इतिहास को प्रथम लिपिबद्ध किया जो अभी तक पासी इतिहास में कभी देखा नहीं गया था । जगह-जगह संगठन बनाकर पासी जाति की सभाएं आयोजित कराई । क्रमबद्ध तरीके से पासी इतिहास को दुनिया में पासी जन तक पहुंचाया और उस समय अपने अधिकारों के लिए लड़ना आवाज उठाना एवं नई चेतना पैदा किया जो 1920 - 21 में क्रांतिकारी मदारी पासी के बाद कुछ 10 सालों के लिए धीमा पड़ गया था वह एक बार फिर से तीव्र गति में आ चुका था । बस फर्क इतना था की जननायक मदारी पासी की क्रांति देशव्यापी था और श्री गुरु चरण देव जी की यह क्रांति पासी जाति सुधार एवं देश की सेवा था ।

✓अब आसान भाषा में समझते हैं !

• एक बात आप समझ लीजिए कि क्रांतिकारी मदारी पासी की जब भी बात आती है तो वह सर्व समाज यानी पूरे देश के लिए जाने गए और उनका एका आंदोलन /eka movement 1920-1921 AD गरीब किसानों मजदूरों के शोषण के खिलाफ था ।
• इसलिए पाठक गढ़ भ्रमित ना हो क्योंकि यह एक दूसरे के बिना भी अधूरे हैं और श्री गुरु चरण देव जी मुख्यतः पासी जाति के समाज सुधार के लिए जाने जाते हैं और श्री गुरु चरण देव मदारी पासी से खासा प्रभावित और प्रेरित थे इनका चाल ढाल बिल्कुल मदारी पासी जैसा ही था विद्रोही तेवर स्वतंत्र प्रवृत्ति और कुछ करने कि ललक थी ।

✓ श्री गुरु चरण देव जी का शुरुआती परिचय 1913-1983

 श्री गुरु चरण देव का आजीवन बाल ब्रह्मचारी थी इन्होंने विज्ञान वाद का सिद्धांत अपनाया यह क्रांतिकारी मदारी पासी से खासा प्रभावित थे और क्रांतिकारी मदारी पासी 1920 के दशक में गरीबों में किसानों में एक लहर पैदा कर दी थी, अत्याचार के खिलाफ लड़ने कि वह लड़ाई अधिकारो की थी बराबरी की थी, सालों साल चले आ रहे जमीदारी तालुकदारी प्रथा की आड़ में हो रहे गरीब किसानों के उत्पीड़न की ।
 
 श्री गुरु चरण देव जी का शुरुआती जीवन क्रांतिकारियों के बीच बीता था इसलिए वह गुरु चरण देव के अंदर क्रांतिकारी विचार थे वह अपने युग के समझ चुके थे अपने क्रांतिकारी विचार से पासी समाज में उस समय एक नई चेतना फूंक दी थी, जिससे पासी समाज 1930-1940 के दशक में अपने गौरवशाली अतीत को हासिल करने में लग गया ,लोग शिक्षित होने लगे अपने अधिकारों को जानने लगे , वह दौर विज्ञानवाद था ,लोग विज्ञान के जरिए पाखंड की पोल खोलने लगे पासी समाज में व्याप्त पाखंड को दूर करने के लिए गुरु चरण देव जी एड़ी चोटी जोर लगा दिया ,वह खुद स्वतंत्र विचार के थे लोगों को स्वतंत्र विचार रहने के उपदेश देते थे ।
" ताकि जो गुलामी मात्र एहसान तले दबकर जमीदारों से जुल्म सहते थे वह भावना भी इनमें दूर रहे "
श्री महात्मा गुरु चरण देव जी योगी से दूरदर्शी थे आधुनिक सोच वाले थे क्रांतिकारी विचार से ओतप्रोत थे ,उनका भेष महात्मा का था लेकिन पूर्णता विज्ञान वादी सिद्धांत के मानने वाले थे पाखंड उनको बिल्कुल भी पसंद नहीं था क्योंकि वह दौर आधुनिक विज्ञानवाद का था वह दौर भगत सिंह और मदारी पासी का था ।

✓ श्री गुरु चरण देव कि वेशभूषा एवं सोच

श्री गुरु चरण देव लंबे कद के 6 फुट से कुछ ज्यादा लंबे थे बाल ब्रह्मचारी एवं जनेऊधारी थे, गहरे सांवला रंग चेहरे पर तेज ,उनके पहनावे में खासतौर से अंतर दिखा वह सफेद कपड़ा पहनते थे ( जैसे मदारी पासी ) और वह अन्य साधुओं की तरह मात्र कपड़े का फेंटा नहीं लपेटते थे, वह दोहरे लॉन्ग की धोती पहनते थे , ताकि अचानक किसी भी आकस्मिक प्रतिक्रिया का जवाब देते उनका पहनावा बाधक ना आये । वह धनुष तीर और फरसा अपने साथ रखते थे उनका भेष बिल्कुल परशुराम जैसा था

श्री गुरु चरण देव शिव को मानने वाले शिव जैसा सादा जीवन व्यतीत करने वाले कल्याण का मार्ग अपनाने वाले , परोपकार के रास्ते पर चलने वाले क्रांतिकारी विचार के थे , वह पारंपरिक रूढ़िवादिता के भी खिलाफ थे वह आधुनिकता को अपनाने पर जोर देते , समय की मांग के हिसाब से खुद को ढालना ,देश प्रेम और समाज के हित में काम करने पर जोर देते हैं उनके कुश्ती के अखाड़े थे , पहलवानी करते करवाते थे ,क्योंकि वह समय ब्रिटिश शासन था और किसी को नहीं पता था कि देश कब आजाद होगा इसलिए

    " उन्होंने देश की और जाति की सेवा करने के लिए पासी वीर दल कायम किया "

वह अपने शिष्यों के नाम के आगे दास नहीं लगाने देते थे कहते थे कि दास गुलामी का प्रतीक होता है नाम के आगे देव लगाओ कहते थे- की हम राजपासी हैं हमने इस देश पर शासन किया है गुरुचरण देव क्रांतिकारी विचार के थे वह समाज के हित में कब ? कौन? सा फैसला ले लेते यह उन पर निर्भर करता था

✓ श्री गुरु चरण देव जी के कार्य एवं उपलब्धियां

श्री गुरु चरण देव वेद और पुराणों के अच्छे जानकार थे दूरदर्शी भी ,उन्होंने अपने ज्ञान से कई बड़े-बड़े ब्राह्मण महात्माओं को साक्षात्कार में परास्त किया जिससे कि उनके निकट के ब्राह्मण उनसे जलने लगे खासतौर से नैमिषारण्य और नैमिषारण्य के पांडव पुजारी से श्री गुरु चरण और उनके मंडली से झड़प भी हुई थी , क्योंकि यह पाखंड विरोधी थे तो समाज में एक नई विचारधारा पैदा कर दी और धीरे-धीरे श्री गुरु चरण देव की लोकप्रियता समाज में फैलती चली गई जैसे कि मदारी पासी की फैली थी ।
                             उन्होंने वेदों और पुराणों एवं अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों की सूक्ष्मता से अध्ययन कर उन्होंने पासी इतिहास को उजागर किया उन्होंने वर्षों वर्षों से चली आई पासी जाति में जो धारणा थी कि " परशुराम ने कुश घास से पांच तलवारे बनाई उसको संचालित करने के लिए पासी बनाया जो परशुराम के पसीने से अवतरित थे" उसका खंडन किया और बताया यहां मात्र ब्राह्मणों के वर्चस्व में बने रहने की कोरी कल्पित कहानी मात्र है जिसका उद्देश्य पासी जाति में हीन भावना पैदा करना मात्र था , उन्होंने इसका खंडन करते हुए कहा पसीने से अव्यवस्थित उत्पत्ति तो हो ही नहीं सकती हां उनके वंशज जरूर हो सकते है । उन्होंने 1930 के दशक में पासी जाति के ऊद्भ्व को सुदृढ़ किया ।

श्री गुरु चरण देव के मतानुसार - " कि परशुराम भृगु के वंश में आते हैं और भृगु धार्मिक ग्रंथो के अनुसार वरुण के लड़के कहे जाते हैं और वरुण को " पाशधर" बोला गया है "पाशी " बोला गया है और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार वरुण को असुर बोला गया है , वही पासी नाग असुर की जाती कही जाती है और ऊपर से पासी लोग प्राचीन समय से भृगु और परशुराम को अपने कुल का मानते आए हैं "
                                     इसलिए गुरु चरण देव को समझने में देर नहीं लगी और भृगु को पासी माना और भृगु वंश समाज कि स्थापना की । क्योंकि वह पाखंडवाद और अंधविश्वास का मुकाबला उचित ज्ञान से करने वाले थे और पाखंड और अंधविश्वास में डूबे हुए पासी समाज को बाहर निकालने की कोशिश की और भृगु वंश की स्थापना मात्र पासी जाति में श्रेष्ठता , उच्चता , स्वछता ,की ओर अग्रसर करवाना था क्योंकि भृगु सबसे श्रेष्ठ माने जाते थे । वह ऋषि भृगु से प्रेरणा लेते थे श्री गुरु चरण देव परशुराम को आदिवासी ही मानते थे ।
   
         " महत्वपूर्ण घटना जो 1935 में घटी "

नोट - 1951 प्रकाशित किताब "पासी छंद शरोदय " में उल्लेखित घटना
"5 ,जनवरी 1935 में दोनावा में सभा हुई उसमें बहुत से महात्मा शामिल हुए जैसे क्षेदम्भू दास साहब और श्याम दास जी साहब बहुत से महात्मा शामिल हुए थे उसमें पासी भाइयों को जनेऊ पहिरआया तो कई अज्ञानी ब्राह्मण जलने लगे उन्होंने कहा- कि जनेऊ ब्राह्मण का है ? पासी कैसे पहनेंगे ? भाइयों की जनेऊ तोड़े और दंगा किया इस पर बड़ा हाहाकार मचा हर तरफ अब सनसनी फैल गई सब कहने लगे कि यह पासी परशुराम के पुत्र भृगुवंशी बन गए हैं ? यह कैसे होगा ? इसलिए इस मामले का फैसला पंडित बंशीधर M.L.A ने किया जिसका कुल हाल खीरी जिले की रिपोर्ट में लिखा है "

क्योंकि उससमय सभी जातियों में समाज सुधार आंदोलन चलाया जा रहा था सभी सभी जातियां ऊपर उठने का प्रयास कर रही थी सभी जातियों में जनेऊ पहनाया जाने लगा जैसे चमार, भंगी ,कुर्मी ,अहिर ,पासी कुम्हार , मुराई, आदि और इन्हीं सभी जातियों का विरोध ब्राह्मण -ठाकुरों ने कड़ा विरोध किया ,क्योंकि उनको कहीं ना कहीं ऐसा लग रहा था कि यह सारी जातियां उनसे ऊपर उठ रही थी , जो उनको हज़म नहीं हो रही थी । अतः यह सारी जातियां समाज सुधार आंदोलन में जनेऊ पहना कर उच्च दर्जा प्राप्त कर रहे थे भला उच्च दर्जा कौन नहीं प्राप्त करना चाहता था !

तो उस समय समाज सुधार आंदोलन की प्रेरणा से भी श्री महात्मा गुरुचरण देव जी ने जनेऊ आंदोलन को अपनाया और पासी जन को जनेऊ पहनाने शुरू किया और उच्चता स्वच्छता और शिक्षा की ओर जोर दिया यहां तक कि शाकाहारी रहने पर बल दिया और मांसाहार को बहिष्कार किया यहां तक कि किसी भी पासी के मांस भक्षण करते हुए पाए जाने पर उस पर जुर्माना भी लगाते थे इतने क्रांतिकारी विचार और बागी तेवर से पासी समाज में जबरदस्त उछाल आया सीतापुर हरदोई लखीमपुर खेरी, रायबरेली, बाराबंकी ,लखनऊ ,बहराइच इलाहाबाद ,आदि में इस भृगु वंश मत का तेजी से फैलाव हुआ क्योंकि हरदोई इसका गढ़ था तो इसका प्रभाव हरदोई में खासा दिखाई पड़ा इसीलिए हरदोई क्षेत्र में शिक्षा का स्तर अन्य जिलों के मुकाबले ज्यादा है और 99% पासी हरदोई के शाकाहारी ही मिलेंगे इसके बाद इलाहाबाद का नंबर आता है

✓ पासी समाज सुधार एवं संघर्ष और 1930-1940-1950

हालांकि आगे चलकर जनेऊ आंदोलन पासी समाज के टूटने का कारण भी बना क्योंकि यह देखा गया कि पासी की उपजातियां आपस में ही भेदभाव करने लगी थी या यूं कहिए कि सत्ताधारीओ की बहुत बड़ी चाल भी थी गुरु चरण देव क्रांतिकारी विचार के थे ,वह समाज के हित में कब ? क्या ? फैसला ले उन्होंने जनेऊ आंदोलन का समर्थन किया , 1949 में में बहुत बड़ी सभा पासियों की कराई उसमें लखनऊ के आसपास के जिलों से भी पासी इकट्ठा हुए और उस सभा में बड़े उपदेश दिए गए और जनेऊ को उतार के फेंक दिया गया

पासियों के जनेऊ पहनने से ब्राह्मण ठाकुर में बड़ा रोष हो गया था कई जगहों पर पासी और ब्राह्मणों में वर्चस्व को लेकर झगड़ा शुरू हो गए थे दो ,तीन की मौत हो गई थी नैमिषारण्य में पांडा - पुजारियों से और पासी संतो के झगड़े हुए , सातन कोट के पास ठाकुर और पासीयों के झगड़े हो गए, फिर बाद में ब्रिटिश सरकार के दखल के बाद मामला शांत कराया गया

✓ जय भृगुवंश - पासी वीर दल 1940

फिर वजूद में आया " पासी वीर दल " श्री गुरु चरण देव ने एक अपना विंग की स्थापना की इन सभी चीजों में सबसे बड़ी चीज ध्यान देने योग्य है वह है श्री गुरु चरण देव जी के कार्य करने के तरीके जो काफी व्यवस्थित और सटीक रहते थे
" पासी वीर दल " की स्थापना पासी समाज सुधार और जाति एवं देश की सुरक्षा हेतु किया गया
     और इसका reclamation department द्वारा संपूर्ण भारत के चित्र सहित पीतल का तमगा पास कराया और गवर्नर से मान्यता प्राप्त की गई
आज भी इस पीतल के तमगे को देखने से पता चलता है भारत का नक्शा है जिसमें धनुष -तीर ,फरसा ,तलवार बना हुआ है

पासी वीर दल में शामिल होने वाले हर एक व्यक्ति के पास यह पीतल का तमगा एवं धनुष ,तीर ,फरसा तलवार रखने की इजाजत थी , इनकी वर्दी होती थी जो नीचे सफेद धोती और ऊपर खाकी रंग की खड़े कॉलर में कोट जैसा लिवास होता था , जो बटनदार ना होकर डोरी दार थे ।
                    ऐसे थे हमारे श्री गुरु चरण देव जी, जो महात्मा थे, अध्यात्म को समझा , जो क्रांतिकारी विचार वाले रहे , यहां तक कि उन्होंने अपने आप को नागवंश से माना और नाग सभ्यता से अपने आप को जोड़ा और सबसे बड़ी बात उस समय 1935 के करीब में उन्होंने अपना एक कमरा नीचे जमीन के नीचे बनवाया कहते थे कि हम नागवंश से हैं यह हमारी सभ्यता है और लखनऊ नागों का बसाया हुआ है जहां कि सुरंगे दूर दूर तक जाती हैं और कितनी तार्किक और ऐतिहासिक बात यह भी है लखनऊ में सुरंग भी पासी जाति ही खोद्दती थी और पासी सुरंग खोदने में बदनाम थे क्योंकि इनकी खोदी गई सुरंग में बिल्कुल सटीक जगहों पर खुलती थी , यह सारी चीजें परंपरागत थी और यही मजबूत विश्वास था श्री गुरु चरण देव जी का कि पासी वह नाग सभ्यता से जुड़े है
और लखनऊ महाराजा लाखन पासी के नाम से बसाया हुआ भी था उन्होंने इतिहास में शोध किया और आल्हा अंक लिखे

✓ Achievements/ उपलब्धियां

• श्री महात्मा गुरुचरण देव जी द्वारा 1940 के दशक में पासी समाज पर पहली बात प्रिंट हुआ यानी कि किताब छपाई और बटवाई
• पासी वीर दल की स्थापना
• भृगु वंश समाज कि स्थापना
• पासी जाति समाज सुधार आंदोलन
• क्रिमिनल ट्राइब से हटाने के लिए भारत सरकार से मांग
• पासी पंचायत प्रणाली को और सुदृढ़ किया आदि ।
• जय सत्य भृगु वंशी समाज पासी वीर महा सभा( किताब)

उस समय के किताबों में मिले श्री गुरु चरण देव के समय के साथी जो निम्न प्रकार से हैं
कालिका प्रसाद तपसी, श्री रग्बा, श्री बलदेव प्रसाद, श्री बहादुर जाजनई वाले , श्री दुनई प्रसाद, श्री मितान ,मा• लोचन लाल तपसी, महात्मा हनुमान लाल लखीमपुर वाले, श्री शिवनाथ ,श्री लखू भक्त, श्री राम भरोसे विकल, श्री मसूरियादीन इलाहाबाद वाले , और अयोध्या प्रसाद अभिलाषी आदि ।
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ऊपर दिए गए सारी जानकारी 1948 और 1951 में लिखी एक किताब श्री गुरु चरण देव जी के बारे में और उनके द्वारा किए गए कार्यों के बारे में जो पासी वीर महासभा में दिया गया है उससे संदर्भित है उपयुक्त तो लेख में श्री गुरु चरण देव जी का सिद्धांत एवं उनके कार्य शैली को उजागर करना मात्र ,आज के पासी समाज के युवाओं को उनसे प्रेरणा लेना चाहिए ।

संग्रह करता एवं शोधकर्ता
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कुंवर प्रताप रावत
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राजा राम पाल पासी का इतिहास अवध के पासियो का इतिहास

 साथियों चक्रवाती सम्राट महाराजा सातन पासी को तो आप जानते होंगे  क्या आप जानते हो उनका नन्हिहाल कहां का था तो जानते है उनके नन्हिहल के बारे ...